इस महीने उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के लिए चुनाव कराया गया. ये सीटें स्नातक और शिक्षक कोटे की थी. इस चुनाव के नतीजे आ गए हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी ने छह और विपक्षी समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हुए इस चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा था. इन नतीजों ने एक तरफ जहां सत्ता पक्ष में चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं, वहीं विपक्षी खेमा चुनाव परिणाम से गदगद है. आइए देखते हैं कि विधानसभा चुनाव 2027 से पहले विधान परिषद चुनाव के ये नतीजे किसके लिए क्या संदेश लेकर आए हैं.
बीजेपी और सपा ने कितनी सीटें जीती हैं
इस चुनाव में बीजेपी ने 11 में से छह सीटें जीतकर 2020 के अपने आंकड़े बरकरार रखा है. लेकिन सपा ने अपनी सीटों में दो सीटें जोड़कर 2027 के चुनाव के लिए बीजेपी के सामने चुनौती पेश की है. इसमें बीजेपी के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसे अपने दो मजबूत गढ़ों में हार का सामना करना पड़ा है. दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बीजेपी को स्नातक और शिक्षक दोनों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है. हालांकि ये दोनों सीटें सपा ने पिछले चुनाव में जीती थीं. लेकिन बीजेपी अगर ये दोनों सीटें विधानसभा चुनाव से पहले जीत जाती तो उससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता और वो अगले चुनाव की तैयारी में जी-जान से जुटते. वहीं बीजेपी को एक और हार लखनऊ में मिली है. यह सीट रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र है. बीजेपी के लिए संतोष की बात यह है कि उसने लखनऊ की शिक्षक सीट पर जीत दर्ज की है, लेकिन स्नातक सीट पर उसे सपा के हाथों हार झेलनी पड़ी है. यहां के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि मतदाताओं ने भले ही बीजेपी को नकारा नहीं हो. लेकिन सपा को स्वीकार जरूर किया है.
विधान परिषद चुनाव को सत्ताधारी दल और प्रत्याशियों के व्यक्तिगत प्रबंधन का चुनाव कहा जाता है. लेकिन नतीजों को सत्ताधारी दल की रणनीति की कसौटी पर जरूर कसा जाता है. घोषित परिणाम और निर्णायक रुझान से साफ है कि सत्ता व संगठन की ताकत के बावजूद बीजेपी सपा पर निर्णायक बढ़त बना पाने में नाकाम रही.ये नतीजे इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और सपा अपना-अपना वोट बैंक मजबूत करने में लगी हुई है. लेकिन इन नतीजों से यह संकेत निकला है कि बीजेपी ने वर्गों तक अपनी बात ठीक से नहीं पहुंचा पाई, जिनमें सपा अपनी पकड़ मजबूत बनाने में जुटी हुई है. लोकसभा 2024 के चुनाव में मिली जीत के बाद मिली इस सफलता से सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हुए हैं. इसकी झलक वाराणसी में देखी गई, वहां अंतिम चरण की मतगणना तक सपा के नेता और कार्यकर्ता हिले नहीं बल्कि डंटे रहे.

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जीत के जातिगत समीकरण क्या रहे
वहीं अगर इस चुनाव के जातिगत समीकरणों की बात करें तो बीजेपी के टिकट पर तीन ब्राह्मण, एक राजपूत, एक सिख और वैश्य समुदाय का एक उम्मीदवार जीता है. वहीं सपा के टिकट पर जीतने वालों में दो यादव, एक कुर्मी, एक कायस्थ और वैश्य समुदाय का एक उम्मीदवार शामिल है. मोटे तौर पर देखें तो बीजेपी और सपा ने अपने परंपरागत वोट बैंक पर कब्जा बनाए रखा है. लेकिन इस चुनाव में सपा ने बीजेपी को आगरा और प्रयागराज जैसे उसके परंपरागत गढ़ में मात दी है. बीजेपी को मिली हार में बड़ा कारण उम्मीदवारों के चयन और पदाधिकारियों की खींचतान को माना जा रहा है.
सपा को भले ही पांच सीटों पर जीत मिली है. लेकिन उसके लिए एक संदेश गोरखपुर-फैजाबाद सीट से निकला है. वहां से सपा ने बीजेपी के बागी डॉक्टर संजयन त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार बनाया था. लेकिन उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा. इस सीट पर बीजेपी के ध्रुव त्रिपाठी ने जीत दर्ज की. निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे राकेश यादव को दूसरा स्थान मिला. इस सीट पर हार-जीत का फैसला बहुत मामूली अंतर से हुआ. मतलब मतदाताओं ने सपा के ब्राह्मण उम्मीदवार को नकार दिया.सपा 2024 के पहले से ही पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) के फार्मूले पर चल रही है. इसका फायदा मिलता उसे दिख रहा है. इसी फार्मूले से उसने लोकसभा का चुनाव जीता और अब विधान परिषद का चुनाव भी जीता है. अब सपा के सामने चुनौती इस सफलता को 2027 के चुनाव से पहले जनसमर्थन में बदलने की है. अब उसे स्थानीय स्तर पर संगठन पर ध्यान देना होगा, जनता के मुद्दों पर ध्यान देना होगा और मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचानी होगी.

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बीजेपी की चुनौती क्या है
ये चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए खराब तो नहीं ही रहे, क्योंकि वह पिछले चुनाव की ही तरह छह सीटें जीतने में सफल रही. वह इस जीत को लेकर जनता के बीच जाएगी. इसे केंद्र और प्रदेश सरकार के प्रदर्शन से जोड़ेगी. लेकिन यह उसके लिए काफी नहीं होगा, क्योंकि सपा वाराणसी और लखनऊ में मिली जीत को भुनाने की कोशिश करेगी. इसलिए ये चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए संगठनात्मक समीक्षा का अवसर हैं. अब उसे उम्मीदवारों के चयन, मुद्दों और अपने नाराज कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर काम करना होगा. यह परिणाम उस समय आए हैं जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता अमित शाह शुक्रवार को लखनऊ पहुंच रहे हैं. उम्मीद की जा रही है कि जब वो बीजेपी के नेताओं के साथ बैठें तो चर्चा इस बात पर भी हो कि कुछ सीटों पर पार्टी को हार का सामना क्यों करना पड़ा और उन कमियों को दूर करने के लिए विधानसभा चुनाव से पहले कौन से कदम उठाने जरूरी हैं.
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