- उद्धव ठाकरे के 9 में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे के पक्ष में चले गए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है
- उद्धव ठाकरे का जनसंपर्क महाराष्ट्र के भीतरी इलाकों में सीमित रहा, जिससे स्थानीय नेताओं के साथ संबंध कमजोर पड़े
- बागी नेताओं ने उद्धव से मिलने में कठिनाई और उनकी कार्यशैली की ऑनलाइन सीमितता को अपनी मुख्य शिकायत बताया है
सियासत में समय और संवाद सबसे बड़े हथियार होते हैं. जब ये दोनों छूट जाते हैं, तो नेता के पास केवल एक ही रास्ता बचता है सड़कों पर उतरकर अपनी साख बचाना! शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे आज ठीक उसी दोराहे पर खड़े हैं. उनके 9 में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे के खेमे में जा चुके हैं और अब डैमेज कंट्रोल के लिए उद्धव बागी सांसदों के गढ़ यवतमाल, वाशिम, हिंगोली, परभणी, धाराशिव और शिरडी का दौरा कर रहे हैं. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है क्या अब बहुत देर हो चुकी है? अगर हम उद्धव ठाकरे के राजनीतिक इतिहास और कार्यशैली का बारीकी से आकलन करें, तो यह स्पष्ट होता है कि उनके और उनके ही जमीनी नेताओं के बीच एक गहरी खाई बन चुकी थी. इसके पहले हुई बगावतों के कारण भी मिलते जुलते थे.
तो क्या यहां चूक गए उद्दव
बाल ठाकरे के विपरीत, उद्धव ठाकरे का जनसंपर्क और महाराष्ट्र के भीतरी इलाकों का दौरा हमेशा सीमित रहा. चुनाव के समय वे चुनिंदा रैलियां जरूर करते थे, लेकिन आरोप लगते हैं की चुनाव के बाद उनका फोकस मातोश्री और मुंबई तक ही सिमट कर रह जाता था. 'वर्क फ्रॉम होम' मुख्यमंत्री! मुख्यमंत्री रहते हुए विशेषकर कोविड के दौरान उनकी कार्यशैली पूरी तरह से ऑनलाइन और सरकारी वर्षा बंगले तक सीमित हो गई थी. बागी नेताओं की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि उनके अपने मुख्यमंत्री तक उनकी पहुंच नहीं थी.
उद्धव पर लगते हैं पहुंच से दूर होने के आरोप
बाग़ी नेताओं का आरोप रहा है कि उद्धव से मिलने के लिए उन्हें उनके करीबी नेताओं की 'फिल्टर' से गुजरना पड़ता था. उन्होंने अपने क्षेत्रीय नेताओं पदाधिकारियों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने में वैसी ऊर्जा खर्च नहीं की, जैसी एकनाथ शिंदे खूब कोशिश करते दिखते हैं. शिंदे 24x7 उपलब्ध रहने वाले नेता बनने की छवि ओढ़ते दिखे, जबकि उद्धव पहुंच से दूर. जब घर टूट रहा था, तब वे अपनों को मनाने में कामयाब नहीं हो पाये उल्टा कहा की जो जाना चाहता है जाये, अब जब सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं, तब वे उनके क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं पर सवाल है इसका असर किसपर और कितना होगा? उद्धव ठाकरे यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे जनता और बचे हुए कैडर से सीधे बात करके सहानुभूति बटोरेंगे. लेकिन राजनीति केवल भावनाओं से नहीं, फंड और विकास से भी चलती है. यवतमाल-वाशिम इसका सबसे ताजा और सटीक उदाहरण है. एक तरफ शनिवार को उद्धव ठाकरे यवतमाल में बागी सांसद संजय देशमुख के इलाके में शिवसैनिकों से संवाद कर रहे थे, दूसरी तरफ, महायुति शिंदे गुट ने एक सोची-समझी सियासी चाल चलते हुए संजय देशमुख के इलाके की नगर परिषदों के लिए 9 करोड़ 40 लाख रुपये का फंड मंजूर कर दिया! (यवतमाल: 2.05 करोड़, वाशिम: 1.65 करोड़, कारंजा: 1.50 करोड़)
ऑपरेशन टाइगर 3.0 बढ़ा रहा टेंशन
ठाकरे गुट के भीतर की बेचैनी केवल सांसदों के जाने तक सीमित नहीं है. अब ऑपरेशन टाइगर 3.0 की सुगबुगाहट तेज है और यह डर विधायकों के टूटने का है! हाल ही में हुई बैठकों के आंकड़े उद्धव ठाकरे की चिंता बढ़ाने के लिए काफी हैं: महाविकास अघाड़ी की अहम बैठक से ठाकरे गुट के 6 विधायक सुनील राउत, गजानन लवटे, बाबाजी काले, राहुल पाटिल, संजय देरकर, संजय पोतनीस नदारद रहे. इनमें से तीन नाम संजय देरकर, राहुल पाटिल और संजय पोतनीस तो ऐसे हैं जो 22 जून को बुलाई गई पार्टी की अंदरूनी बैठक से भी गायब थे.
जब 22 जून को विधायकों की गैरमौजूदगी पर सवाल हुआ, तो मुख्यमंत्री शिंदे ने हंसते हुए कहा था- "बस तीन क्या?" यह आत्मविश्वास बताता है कि शिंदे के संपर्क में अभी कई और UBT विधायक हैं! इस पुख्ता करते हुए उनके नेता बयान दे रहे हैं की उद्धव के 14 विधायक टूटेंगे! इतना ही नहीं BMC में भी ऑपरेशन टाइगर की तैयारी के तहत पार्षदों पर भी शिंदे गुट की नज़र है!
MVA की बैठक में दिखा था उद्धव का दर्द
उद्धव ठाकरे का दर्द MVA की बैठक में छलक कर बाहर आ गया, जब उन्होंने अपने सहयोगियों से पूछा "क्या हम सच में एक साथ हैं?"उनकी यह हताशा लाजिमी है, क्योंकि सांसदों के टूटने के बाद MVA की जिस समन्वय बैठक से उन्हें उम्मीद थी, उसमें खुद शरद पवार और जयंत पाटिल निजी कारणों से नहीं आए. 60 में से कुल 23 MVA विधायक गायब रहे. यह स्पष्ट संकेत है कि उद्धव अब अपने सहयोगियों पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहे हैं!
उद्धव ठाकरे के ये तीन दिवसीय दौरे यवतमाल से शिरडी तक पार्टी कैडर में ऊर्जा भरने का एक प्रयास जरूर हैं, लेकिन उद्धव गुट में चलती आँधियाँ बताती हैं की यह डैमेज कंट्रोल बहुत देर से शुरू हुआ. अगर उन्होंने सत्ता में रहते हुए अपने विधायकों-सांसदों के साथ यही संवाद बनाए रखा होता, उनके क्षेत्रों में फंड सुनिश्चित किया होता, तो आज उन्हें इस तरह बागियों के गढ़ में जाकर अपनी प्रासंगिकता साबित नहीं करनी पड़ती. अब यह लड़ाई केवल शिवसैनिकों की वफादारी के भरोसे लड़ी जा रही है, जबकि सामने वाले खेमे के पास सत्ता, पैसा और एक मजबूत राजनीतिक चक्रव्यूह है.
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