बात जब कर्नाटक की होती है, तो हमारे जेहन में आईटी हब और बड़े-बड़े शहर आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के इस सातवें सबसे बड़े राज्य का 20 फीसदी से ज्यादा हिस्सा घने जंगलों से ढका है. 38 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले ये जंगल दुनिया के 35 'बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट' में से एक हैं.
लेकिन आज हम इन जंगलों की नहीं, बल्कि उस हस्ती की बात करेंगे जिसने इन जंगलों को अपनी सांसों से सींचा है. एक ऐसी महिला, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा. जिन्होंने विज्ञान की कोई मोटी किताब नहीं पढ़ी, लेकिन आज बड़े-बड़े वैज्ञानिक उनके सामने नतमस्तक हैं. दुनिया उन्हें 'जंगलों की एनसाइक्लोपीडिया' यानी चलता-फिरता शब्दकोश कहती है. मिलिए पद्मश्री तुलसी गौड़ा से, जिनके निधन पर पीएम मोदी ने भी दुख जताया था.
महज 12 साल की उम्र और सवा रुपये की नौकरी
ये कहानी तब शुरू हुई, जब एक आदिवासी परिवार में जन्मीं तुलसी जी महज 12 साल की थीं. उन्होंने एक लोकल नर्सरी में पौधों की देखभाल शुरू की. उनके हाथों में जैसे कोई जादू था. कुछ ही सालों में वो सिर्फ बीज को देखकर और छूकर बता देती थीं कि इसे पनपने के लिए कैसी मिट्टी, कैसा मौसम और कितनी खाद चाहिए.
साल 1960 में जब कर्नाटक वन विभाग की नजर इस 'वन-देवी' पर पड़ी, तो वो भी हैरान रह गए. उन्होंने तुलसी को नौकरी का न्योता दिया. सैलरी थी- मात्र सवा रुपये. लेकिन तुलसी के लिए पैसे नहीं, पेड़ अहम थे. उन्होंने ये नौकरी खुशी-खुशी कुबूल कर ली.
डिग्रियों पर भारी पड़ा तजुर्बा
उनका काम करने का तरीका बिल्कुल अलग था. वो जंगल से बीज लातीं, नर्सरी में पौधे तैयार करतीं और फिर उन्हें वापस जंगल की गोद में रोप देतीं. वन विभाग के बड़े-बड़े अफसर हैरान थे कि जो बातें सालों की पढ़ाई के बाद भी समझ नहीं आतीं, वो तुलसी अपनी सटीक भविष्यवाणी से चुटकियों में बता देती थीं. जल्द ही पूरा विभाग उनके इस ज्ञान पर निर्भर हो गया और उन्हें विलुप्त हो रहे दुर्लभ पौधों को बचाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई.
वन विभाग के साथ उनका ये सफर पूरे 60 सालों तक चला. उन्होंने अपने हर कदम से बंजर होते इकोसिस्टम में नई जान फूंक दी. उन्होंने अकेले दम पर 300 से ज्यादा स्थानीय प्रजातियों के लाखों पौधे उगाए हैं.
750 वर्ग किलोमीटर में फैले अंकोला के जंगलों का चप्पा-चप्पा उनकी उंगलियों पर था. सागौन, चंदन, यूकेलिप्टस, नीम, पीपल... हर पेड़ की नस-नस से वो वाकिफ हैं. कौन सा बीज कब बोना है, फल कब पकेगा, बीज कब इकट्ठा करने हैं... ये सब उन्हें किसी किताब ने नहीं, बल्कि जंगलों की आबोहवा ने सिखाया है.
एक मिशन जो थमा नहीं
रिटायरमेंट के बाद भी उनका ये मिशन थमा नहीं. कर्नाटक की हरियाली बचाना जैसे उनकी जिंदगी का इकलौता मकसद बन गया. वो आज भी गांव-गांव जाकर लोगों को पौधे उगाने की ट्रेनिंग देती. वह अपनी जिंदगी में करीब 30 हजार पौधे लगा चुकी थीं.
उनके इसी निस्वार्थ प्रेम और हरित क्रांति के लिए, साल 2021 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' से नवाजा गया. साल 2024 में 86 की उम्र उनका निधन हो गया.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं