आप दफ्तर में वॉशरूम गए. हाथ धोया. 2-4 टिशू पेपर निकालकर हाथ पोंछे और डस्टबिन में डालकर बाहर निकल आए. अब आपके जैसे ही आपके दफ्तर में कम से कम 200-300 लोग तो होंगे. जो दिन में 4-5 बार वॉशरूम जाते होंगे, टिशू से हाथ पोंछते होंगे और उसे डस्टबिन में डालकर वापस अपना काम करने लग जाते होंगे. जाने-अनजाने में ऐसा करके आपने और आपके दफ्तर के लोगों ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचा दिया.
लेकिन अगर वहां हैंड ड्रायर लगा होता तो? फिर आप अपना हाथ उस मशीन में डालते, सुखाते और वापस आकर काम करने लगते. इससे दो फायदे होते. पहला- न तो टिशू का इस्तेमाल करना पड़ा. और दूसरा- टिशू का कचरा भी नहीं होता.
ये सारी बातें इसलिए क्योंकि टिशू पेपर का इस्तेमाल आज जबरदस्त तरीके से हो रहा है और जिस चीज से ये बनता है, वह हमारे और हमारे भविष्य और हमारे पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी है और वह है- पेड़.
टिशू से क्या है इशू?
पर्यावरण पर काम करने वाली कंसल्टेंसी फर्म 'Edge' की अप्रैल 2022 में एक रिपोर्ट बताती है कि टिशू पेपर बनाने के लिए हर दिन 10 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटा जाता है. ये आंकड़ा और बड़ा भी हो सकता है, अगर टिशू पेपर बनाने के लिए रिसाइकलिंग को बंद कर दिया जाएगा. इस स्टडी में अनुमान लगाया गया था कि अगर रिसाइकलिंग न हो तो हर दिन लगभग 20 लाख पेड़ों को काटने की नौबत आ जाएगी.
भारत को लेकर ऐसे कोई आंकड़े नहीं हैं. लेकिन कई स्टडीज और रिपोर्ट्स बताती हैं कि एक टन टिशू पेपर बनाने के लिए कम से कम 17 पेड़ों को काटा जाता है. और भारत में टिशू पेपर की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. पेपरमार्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में भारत में टिशू पेपर की अनुमानित मांग 1.69 लाख टन थी जो 2032 तक बढ़कर 5.50 लाख टन तक पहुंच सकती है. इसका मतलब हुआ कि भारत में हर साल टिशू पेपर की मांग लगभग 9 फीसदी की दर से बढ़ रही है.
टिशू बनाने में क्या-क्या लगता है?
टिशू पेपर को बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके हर पड़ाव में पर्यावरण को नुकसान के अलावा और कुछ नहीं पहुंचता. मतलब टिशू के बनने से लेकर उसके खात्मे तक... पर्यावरण को चोट ही चोट पहुंचती है. वह कैसे? तो इसका जवाब है कि टिशू बनता है पेड़ की खाल से या फिर रिसाइकल फाइबर से. फिर इसे बनाने के लिए पानी लगता है. अनुमान है कि एक टन टिशू पेपर बनाने के लिए 10 से 17 हजार लीटर पानी लगता है. इस हिसाब से 100 टिशू का एक बॉक्स बनाने में 1 से 1.5 लीटर पानी लग जाता है.
इतना ही नहीं, इसे सफेद रंग देने के लिए पहले क्लोरीन का इस्तेमाल होता था, जिससे डाइऑक्सिन जैसे केमिकल निकलते थे. अब ज्यादातर बड़ी कंपनियां क्लोरीन-फ्री ब्लीचिंग का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन इस प्रोसेस में अब भी काफी केमिकल का इस्तेमाल होता है.आखिर में टिशू पेपर के साथ सबसे खतरनाक बात यह है कि इसे रिसाइकल नहीं किया जा सकता. एक बार इस्तेमाल होने के बाद टिशू पेपर सीधे कचरा बनता है.
फिर क्या किया जा सकता है?
अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि टिशू पेपर नहीं तो क्या? इसका एक जवाब है- हैंड ड्रायर. आज के समय में मॉल और दफ्तरों में हैंड ड्रायर लगाए भी जा रहे हैं.
टिशू पेपर की खपत को कम करने में हैंड ड्रायर काफी कारगर भी साबित हुए हैं. हालांकि, इस बात का कोई ठोस सबूत या स्टडी नहीं है कि हैंड ड्रायल का इस्तेमाल किया जाए तो कितने पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है? लेकिन फिर भी कुछ बातें हो जो बताती हैं कि अगर हैंड ड्रायर का इस्तेमाल हो तो पेड़ों को बचाया जा सकता है.
अमेरिकी कंपनी Zurn Water Solution ने 2021 में अपनी स्टडी में दावा किया था कि उनकी हैंड ड्रायर मशीन ने एक साल में 5 अरब टिशू पेपर को रिप्लेस कर दिया था, जिस कारण सालाना 2 लाख पेड़ों को कटने से बचाया गया.
इसी तरह 2007 में अमेरिकी कंपनी 'World Dryer' ने कंसास के सरकारी स्कूलों में 102 हैंड ड्रायर लगाए थे. इसके बाद उसने अपनी स्टडी में दावा किया कि हैंड ड्रायर के कारण एक साल में 34.5 टन कचरा कम निकला, 6.90 लाख गैलन पानी बचा और 587 पेड़ों को कटने से बचाया गया. इसी तरह उसने आयोवा में भी 153 हैंड ड्रायर लगाए थे और दावा किया कि इससे 10.5 टन कचरा और 176 पेड़ों को बचाया गया.
World Dryer दावा करता है है कि उसकी एक मशीन एक साल में 17 पेड़ों को कटने से बचाती है. यानी, 10 साल की लाइफ साइकिल में 170 पेड़ों को बचाया जा सकता है.
ये सही है कि अगर हैंड ड्रायर का इस्तेमाल हो तो टिशू पेपर की खपत को कम किया जा सकता है. लेकिन यहां भी दो बड़ी समस्याएं हैं. पहला- हैंड ड्रायर सिर्फ हाथ सुखाने के काम आता है. ऐसे में चेहरा पोंछने या टॉयलेट में पेपर का इस्तेमाल तो होगा ही. और दूसरा- हैंड ड्रायर से बैक्टिरिया निकलते हैं, जो सेहत के लिए हानिकारक है.
ऐसे में सबसे अच्छा तरीका यही है कि अपने पास हमेशा कोई नेपकिन या रूमाल साथ रखें और बहुत जरूरी हो तो ही टिशू पेपर का इस्तेमाल करें.
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