New Delhi: सदियों से आर्कटिक के ठंडे रास्तों पर जहाज ले जाने का सपना हर नाविक ने देखा है. उस समय, यह एक जोखिम भरा सपना था, जिसमें जान का खतरा सबसे अधिक था. मगर, अब वक्त बदल चुका है. 'इंडिया नैरेटिव' की ताजा रिपोर्ट कहती है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से बर्फ पिघल रही है, और इससे यह सपना एक नई जियोपॉलिटिकल योजना में बदल गया है. भारत इस बदलाव को केवल एक अवसर नहीं मानता, बल्कि इसे वह अपनी वैश्विक स्थिति मजबूत करने के लिए एक अहम मोड़ मान रहा है. जैसे शतरंज में 'क्वीन्स गैम्बिट' होता है, वैसे ही यहां भी बर्फ तो पिघल रही है लेकिन अवसर कायम हैं.
'बर्फ पिघल रही है, लेकिन मौका नहीं'
कुछ चालें ऐसी होती हैं जिनमें शुरुआत से ही दबदबा बनाकर पूरा खेल अपने हाथ में ले लिया जाता है. रिपोर्ट का कहना है कि भारत को आर्कटिक में भी इसी तरह का तरीका अपनाना चाहिए. जब एक नया रास्ता खुल रहा है, तब नई दिल्ली को देरी करने के बजाय तुरंत आगे बढ़ना चाहिए. भारत लंबे समय से रणनीतियों की योजना बनाता आया है. अब वक्त आ गया है कि इस क्षेत्र के नियम वही तय करे, न कि दूसरों के बनाए नियमों पर चले. जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है- 'बर्फ पिघल रही है, मौका नहीं'.
स्वेज नहर से 40% छोटा है यह नया रास्ता
यह नया रास्ता स्वेज नहर से 40% छोटा पड़ता है और यह आर्कटिक में स्थित है. बर्फ के पिघलने से 'नॉर्दर्न सी रूट' नामक एक नया समुद्री मार्ग तैयार हो रहा है. यह रास्ता रूस के समुद्री तटों से होकर बारेंट्स सागर से बेरिंग स्ट्रेट तक फैला हुआ है. इसके सबसे बड़े फायदों में से एक यह है कि यह पूर्वी एशिया और यूरोप के बीच की दूरी पारंपरिक स्वेज नहर वाले मार्ग की तुलना में लगभग 40% कम कर देता है. छोटा रास्ता होने का मतलब है सामान तेजी से पहुंचेगा, ईंधन की बड़ी बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा.
नॉर्डिक देशों के साथ मजबूत होती पक्की दोस्ती
भारत नॉर्डिक देशों के साथ अपनी दोस्ती को मजबूत बना रहा है और इसके लिए इंडिया-नॉर्डिक समिट का सहारा लेता रहता है. बातचीत और रिश्तों को मजबूत करना भारत की प्राथमिकता है. ये महज औपचारिक मुलाकातें नहीं हैं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा हैं. इस योजना के माध्यम से भारत खुद को लोकतांत्रिक देशों के बीच उभर रही नई वैश्विक सप्लाई चेन में शामिल कर रहा है. इन देशों के साथ भारत विशेष रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान दे रहा है. पहला- समुद्री सुरक्षा, दूसरा- ब्लू इकोनॉमी और तीसरा- सस्टेनेबल इन्फ्रास्ट्रक्चर.
8 देशों के सहयोग से आगे बढ़ रहा भारत
नॉर्डिक-बाल्टिक 8 देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है. फिनलैंड और स्वीडन के नाटो में शामिल होने से क्षेत्र की सुरक्षा का ढांचा बदल चुका है. भारत ने बहुत ही सूझ-बूझ से नॉर्डिक-बाल्टिक 8 देशों जैसे डेनमार्क, एस्टोनिया, फ दुनिया का ध्यान अब यह समझने पर है कि यूरोप-अटलांटिक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. भारत की खासियत यह है कि वह इंडो-पैसिफिक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए भी रूस के साथ पुराने संबंध बनाए रखता है. इस देश ने बिना किसी पक्ष की ओर झुके सभी के साथ संतुलन कायम किया है, जो शायद ही कोई और कर सकता है.
टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी का कॉम्बिनेशन
टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी में भारत और नॉर्डिक-बाल्टिक देशों के बीच अद्भुत तालमेल दिख रहा है. नॉर्डिक देशों के पास बिना पॉल्यूशन वाले जहाज, समुद्री विंड एनर्जी और आर्कटिक के ठंडे मौसम में काम करने की तकनीक मौजूद है. इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की बेहतरीन तकनीक भारत के ग्रीन ट्रांजिशन के लक्ष्य से पूरी तरह मेल खाती है. दूसरी ओर, एस्टोनिया का ई-गवर्नेंस मॉडल और बाल्टिक देशों का मजबूत साइबर सुरक्षा सिस्टम भारत के UPI और डिजिटल आइडेंटिटी जैसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर एक शानदार टेक पार्टनरशिप तैयार कर सकते हैं. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत को उन वेंडर कंपनियों से बचाव मिलेगा जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
कुल मिलाकर देखा जाए तो पिघलती बर्फ केवल एक भौगोलिक घटना नहीं है. यह भारत के लिए ग्लोबल सुपरपावर बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
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