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30 साल, 800 से ज्यादा एयर शो.. आसमान में तिरंगा लहराने वाली वायुसेना की 'सूर्यकिरण' क्यों है खास

भारतीय वायु सेना की सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम 30 साल पूरे होने पर चर्चा में है. 1996 में स्थापित यह टीम आज दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में शामिल है और अपने लाल-सफेद जेट्स व तिरंगे धुएं के साथ शानदार करतबों के लिए जानी जाती है.

30 साल, 800 से ज्यादा एयर शो.. आसमान में तिरंगा लहराने वाली वायुसेना की 'सूर्यकिरण' क्यों है खास
  • भारतीय वायु सेना की सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम 26 मई 2026 को अपनी तीसरी वर्षगांठ मना रही है.
  • टीम ने शुरुआत में किरण एमके-2 विमानों से प्रदर्शन किया और बाद में एमके-132 जैसे विमानों का उपयोग किया गया है.
  • सूर्यकिरण टीम ने पिछले तीन दशकों में भारत और विदेशों में 800 से अधिक एयर शो आयोजित किए हैं.

भारतीय वायु सेना की मशहूर सूर्यकिरण एरोबेटिक टीम 26 मई 2026 को अपने 30 साल पूरे करने जा रही है. तीन दशक पहले शुरू हुई यह टीम आज दुनिया की प्रमुख एरोबेटिक टीमों में गिनी जाती है. लाल और सफेद रंग के जेट जब आसमान में बेहद करीब उड़ते हैं, तो हजारों लोग उन्हें देखने पहुंच जाते हैं. कभी विमान तिरंगे धुएं के साथ दिल की आकृति बनाते हैं, तो कभी डीएनए जैसी डिजाइन. इसी वजह से भारतीय वायु सेना सूर्यकिरण टीम को अपना “एंबेसडर” भी कहती है.

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यह टीम सिर्फ एयर शो नहीं करती, बल्कि वायु सेना का अनुशासन, सटीकता और पायलटों की क्षमता भी दिखाती है. सूर्यकिरण का मतलब होता है “सूरज की किरणें”. इस टीम की स्थापना 27 मई 1996 को कर्नाटक के बीदर एयर फोर्स स्टेशन में हुई थी. शुरुआत में टीम एचएएल के बनाए किरण एमके-2 विमान उड़ाती थी.

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टीम ने सितंबर 1996 में कोयंबटूर में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था. उस समय लोगों ने पहली बार इतने विमानों को एक साथ बेहद करीब उड़ते देखा था. इसके बाद सूर्यकिरण टीम तेजी से लोकप्रिय हो गई. 1998 में टीम ने नौ विमानों की फॉर्मेशन शुरू की. उसी साल स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के ऊपर नौ विमानों का प्रदर्शन हुआ था, जो काफी चर्चा में रहा. पिछले 30 वर्षों में सूर्यकिरण टीम 800 से ज्यादा एयर शो कर चुकी है. भारत के लगभग हर बड़े शहर में टीम ने प्रदर्शन किए हैं. इसके अलावा चीन, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी टीम ने भारतीय वायु सेना का प्रतिनिधित्व किया है.

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हालांकि टीम का सफर आसान नहीं रहा. 2011 में सूर्यकिरण टीम को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था. उस समय किरण विमानों की कमी हो गई थी और वायु सेना को ट्रेनिंग के लिए इन विमानों की जरूरत थी. करीब चार साल तक टीम का कोई बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं हुआ. फिर 2015 में सूर्यकिरण टीम की वापसी हुई. इस बार टीम को आधुनिक हॉक एमके-132 विमान दिए गए. हॉक विमान ज्यादा आधुनिक और ताकतवर माने जाते हैं, जिनमें बेहतर इंजन, डिजिटल सिस्टम और आधुनिक कॉकपिट लगे हैं.

लाल और सफेद रंग वाले यही हॉक जेट अब सूर्यकिरण टीम की नई पहचान बन चुके हैं. टीम की सबसे बड़ी खासियत इसकी नौ विमानों वाली फॉर्मेशन है. दुनिया में बहुत कम एरोबेटिक टीमें इतनी बड़ी फॉर्मेशन में प्रदर्शन करती हैं. टीम के विमान कई बार सिर्फ 5 से 10 मीटर की दूरी पर उड़ते हैं. इतनी कम दूरी पर तेज रफ्तार से उड़ान भरना बेहद कठिन माना जाता है और एक छोटी गलती भी बड़ा हादसा बन सकती है.

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एयर शो के दौरान टीम डायमंड फॉर्मेशन, लूप, रोल, बॉम्ब बर्स्ट और डीएनए मैन्यूवर जैसे कठिन करतब दिखाती है. डीएनए मैन्यूवर में विमान आसमान में डीएनए जैसी आकृति बनाते हैं, जो तिरंगे धुएं के साथ बेहद आकर्षक दिखाई देती है. इन करतबों के दौरान पायलटों के शरीर पर भारी दबाव पड़ता है. सूर्यकिरण टीम में शामिल होना किसी भी फाइटर पायलट के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है. चुने गए पायलटों को कई महीनों तक कठिन ट्रेनिंग दी जाती है. हर उड़ान के बाद वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर छोटी-छोटी गलतियों पर चर्चा होती है.

30वीं वर्षगांठ के मौके पर बीदर एयर फोर्स स्टेशन में विशेष कार्यक्रम आयोजित होगा, जिसमें मौजूदा और पूर्व पायलटों के साथ इंजीनियर और तकनीकी कर्मचारी भी शामिल होंगे. भारतीय वायु सेना का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सूर्यकिरण टीम ने दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. आज इसकी तुलना ब्रिटेन की रेड एरोज और अमेरिका की थंडरबर्ड्स जैसी मशहूर एरोबेटिक टीमों से की जाती है.

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