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35 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में पूर्व बैंक मैनेजर बरी, सुप्रीम कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार

इस मामले में अदालत ने सीबीआई की जांच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एजेंसी आरोप साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही है.

35 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में पूर्व बैंक मैनेजर बरी, सुप्रीम कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने 35 डाल पुराने मामले में पूर्व बैंक मैनेजर को बरी कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने करीब 35 साल पुराने भ्रष्टाचार मामले में इंडियन बैंक के पूर्व शाखा प्रबंधक वी. बालकृष्णन को पूरी तरह बरी कर दिया है. अदालत ने न केवल उनकी दोषसिद्धि रद्द की बल्कि मामले की जांच करने वाली केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए.

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सीबीआई आरोपों को साबित करने में बुरी तरह विफल रही. अदालत के अनुसार अभियोजन का पूरा मामला कमजोर साक्ष्यों पर आधारित था और उसके पास आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं था.

क्या था मामला?

यह मामला वर्ष 1991-92 का है, जब वी. बालकृष्णन चेन्नई स्थित इंडियन बैंक की अन्ना नगर शाखा के प्रबंधक थे. सीबीआई ने आरोप लगाया था कि उन्होंने इंडियन ओवरसीज बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी कुमारदेवन के साथ मिलकर दो व्यक्तियों को गलत तरीके से ऋण दिलाया.

जांच एजेंसी के अनुसार इनमें से एक व्यक्ति कुमारदेवन के घर में धोबी का काम करता था. उसके लिए 13.50 लाख रुपये के ऋण की सिफारिश करते समय उसे रियल एस्टेट कारोबारी बताया गया था. साथ ही आरोप था कि ऋण की औपचारिक मंजूरी से पहले ही 3.30 लाख रुपये जारी कर दिए गए थे. दूसरे व्यक्ति को 21.39 एकड़ जमीन खरीदने के लिए 10 लाख रुपये का ऋण दिया गया था. सीबीआई का दावा था कि इस जमीन का मूल्यांकन वास्तविक कीमत से कहीं अधिक दिखाया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किए आरोप 

अदालत ने पाया कि सीबीआई का मुख्य आरोप इस बात पर आधारित था कि ऋण की राशि वास्तव में कुमारदेवन के इस्तेमाल में गई थी. इसके समर्थन में एजेंसी ने कुछ चेकों पर मौजूद हस्ताक्षरों का हवाला दिया था.

लेकिन सुनवाई के दौरान यह साबित नहीं हो सका कि वे हस्ताक्षर वास्तव में कुमारदेवन के ही थे. अदालत ने कहा कि न तो उनके हस्ताक्षरों के समकालीन नमूने पेश किए गए और न ही ऐसे किसी अधिकारी को गवाह बनाया गया जो उन्हें पहचान सकता था. पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित ऋण केवल शाखा प्रबंधक के स्तर पर मंजूर नहीं किए गए थे, बल्कि उन्हें बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय की स्वीकृति भी प्राप्त थी.

नीलामी से बैंक को मिला पूरा पैसा

संपत्तियों के कथित अधिक मूल्यांकन को लेकर भी अदालत ने निचली अदालतों के निष्कर्षों पर सवाल उठाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1991-92 में संपत्ति की वास्तविक कीमत साबित करने के लिए उस समय के दस्तावेज पेश ही नहीं किए गए. अदालत ने यह भी नोट किया कि बाद में संपत्तियों की नीलामी से बैंक ने अपना पूरा बकाया वसूल कर लिया था. इतना ही नहीं, बैंक को ऋण राशि से अधिक रकम भी प्राप्त हुई थी.

अतिरिक्त रकम पर भी कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि नीलामी के बाद बची अतिरिक्त राशि अब तक बैंक के पास क्यों पड़ी है. कोर्ट ने कहा कि कानूनी वारिसों का पता लगाकर उन्हें यह रकम देने का प्रयास किया जाना चाहिए था. अदालत ने इंडियन बैंक को इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसलों को पलटते हुए वी. बालकृष्णन को "क्लीन एक्विटल" दे दी.

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