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कानून संविधान के अनुसार बनाए जाते हैं नक्सलियों के हिसाब से नहीं... SC में तुषार मेहता के जिरह पर भिड़े वकील

'वंदे मातरम्' मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस छिड़ गई.

कानून संविधान के अनुसार बनाए जाते हैं नक्सलियों के हिसाब से नहीं... SC में तुषार मेहता के जिरह पर भिड़े वकील
सुप्रीम कोर्ट में तुषार मेहता और मुरलीधर के बीच नोकझोंक
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  • सुप्रीम कोर्ट में वंदे मातरम् मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की टिप्पणी पर विवाद हो गया
  • वकील मुरलीधर ने कहा कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान अधिनियम में संशोधन जल्दबाजी में किया गया
  • तुषार मेहता ने कहा कि कानून संविधान के अनुसार बनाए जाते हैं और नक्सलियों के विचारों के अनुसार नहीं

'वंदे मातरम्' मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में उस समय तीखी बहस हो गई, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी पर सीनियर वकील डॉ. एस. मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताई. मुरलीधर इस मामले में याचिकाकर्ता और प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की ओर से पेश हुए थे. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने सुनवाई के दौरान मुरलीधर ने दलील दी कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में हाल में किया गया संशोधन जल्दबाजी में लाया गया है और इसके लिए व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास नहीं किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि संशोधन में यह स्पष्ट नहीं है कि 'राष्ट्रीय गीत' से आशय क्या है.

तुषार मेहता के किस बयान पर मचा बवाल?

मुरलीधर ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में आदर्श रूप से सार्वजनिक विमर्श और सहमति विकसित की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि कानून बनाने में 'ऊपर से नीचे' का नजरिया उचित नहीं माना जा सकता. इसी दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कानून संविधान के अनुसार बनाए जाते हैं और 'नक्सलियों के विचारों के अनुसार कानून नहीं बनाए जा सकते.'

मेहता की इस टिप्पणी पर मुरलीधर ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई. उन्होंने कहा कि सॉलिसिटर जनरल को इस शब्द का इस्तेमाल वापस लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि कार्यवाही का सीधा प्रसारण हो रहा है और ऐसी अभिव्यक्ति का इस्तेमाल उचित नहीं है. मुरलीधर ने कहा, 'मैं नहीं चाहता कि सॉलिसिटर जनरल की ऐसी अभिव्यक्ति लाइव जाए. मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं. सॉलिसिटर अपनी टिप्पणी वापस लें.'

इस पर तुषार मेहता ने कहा कि उनका आशय केवल इतना था कि निर्णय लेने की प्रक्रिया संविधान के अनुसार होती है. लेकिन मुरलीधर ने जवाब दिया कि वह मुद्दे को दूसरी दिशा में ले जा रहे हैं और उन्हें अपनी टिप्पणी वापस लेनी चाहिए.

जस्टिस बागची ने किया हस्तक्षेप

बहस बढ़ने पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत में 'अनावश्यक तनाव और भावनाएं' पैदा की जा रही हैं. इस पर मुरलीधर ने कहा कि किसी कानून अधिकारी को इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले कभी किसी कानून अधिकारी को ऐसी अभिव्यक्ति का इस्तेमाल करते नहीं सुना.

तुषार मेहता ने जवाब में कहा कि संविधान के तहत लिए गए फैसलों को चुनौती नहीं दी जा सकती. इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि अदालत केवल संवैधानिक व्याख्या के कानूनी प्रश्न पर विचार कर रही है और सभी पक्षों को उसी तक सीमित रहना चाहिए.

हालांकि आदेश पारित होने के बाद भी मुरलीधर ने इस मुद्दे को दोबारा उठाया और कहा कि सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी कानून अधिकारी की गरिमा के अनुरूप नहीं है. जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत ने उन टिप्पणियों का संज्ञान नहीं लिया है और वह केवल संवैधानिक प्रश्न पर ध्यान दे रही है.

मेहता बोले- मैं फिर दोहरा सकता हूं अपना बयान

इस दौरान तुषार मेहता ने अपनी टिप्पणी पर खेद जताने से इनकार करते हुए कहा, 'मैंने जो कहा है, उसे दोहरा सकता हूं. मैंने कहा था कि यह संवैधानिक तरीका है, न कि वह तरीका जो नक्सली चाहते हैं. मुझे इस पर कोई खेद नहीं है.' इसके जवाब में मुरलीधर ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल 'गैलरी के लिए खेल रहे हैं' और उन्होंने अपनी आपत्ति दोहराई.

सुनवाई के बाद जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति को 'नक्सली' कह देने भर से उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते. उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतों की विश्वसनीयता इसी बात में है कि वे आरोपित आतंकवादियों तक को कानून के तहत समान अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई उपलब्ध कराती हैं.

तुषार मेहता ने बाद में स्पष्ट किया कि उनका इशारा किसी व्यक्ति विशेष की ओर नहीं था, बल्कि एक विचारधारा की ओर था. इस पर जस्टिस बागची ने दोहराया कि अदालत ने उन टिप्पणियों को महत्व नहीं दिया है.

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