- SC का राज्य नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों के वेतन संबंधी याचिका को अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई से अस्वीकार
- न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित कर पुजारियों और स्टाफ के वेतन तथा सुविधाओं की समीक्षा की मांग की गई थी
- याचिका में मंदिर स्टाफ को कर्मचारी घोषित करने और सम्मानजनक वेतन देने की मांग की गई थी
सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के पुजारियों के वेतन को लेकर दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. याचिका में राज्य की ओर से नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों, सेवादारों और स्टाफ के वेतन व अन्य सुविधाओं की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई थी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस याचिका पर अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई नहीं की जा सकती और जो लोग इससे प्रभावित हैं, वे सीधे संबंधित अदालत का रुख कर सकते हैं.
आप पुजारियों के मामलों में दखल न दें- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय से कहा कि पुजारियों के मामलों में दखल न दें क्योंकि संभव है कि उन्हें पुजारियों और सेवादारों की वास्तविक आय की पर्याप्त जानकारी न हो. इस पर अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के कई फैसले ऐसे हैं, जिनमें राज्य नियंत्रित मंदिरों के पुजारियों के वेतन की समीक्षा करने की जरूरत बताई गई है ताकि उन्हें सम्मानजनक जीवन मिल सके
याचिका में क्या मांग की गई थी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विस्तृत सुनवाई से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी, साथ ही यह छूट दी कि वह कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकते हैं.यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा, वकील अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर की गई थी. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे राज्य नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों और स्टाफ के वेतन व सुविधाओं की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करें.
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि पुजारियों और मंदिर स्टाफ को ‘कोड ऑन वेजेस, 2019' की धारा 2(k) के तहत कर्मचारी घोषित किया जाए. याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब राज्य किसी मंदिर का प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है, तो वहां नियोक्ता‑कर्मचारी (employer‑employee) का संबंध बन जाता है.ऐसे में पुजारियों और स्टाफ को सम्मानजनक वेतन न देना,उनके जीविका के अधिकार (Right to livelihood) का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है.
याचिकाकर्ता का दावा: पुजारियों को नहीं मिल रही न्यूनतम मजदूरी
अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इस मामले की शुरुआत तब हुई जब 4 अप्रैल को वह वाराणसी एक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. उन्होंने बताया कि काशी विश्वनाथ मंदिर, जो राज्य के नियंत्रण में है, वहां रुद्राभिषेक करने के बाद पता चला कि वहां के पुजारियों और मंदिर स्टाफ को सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है.
याचिका में कहा गया कि हाल ही में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया था. उनकी मांग थी कि उन्हें न्यूनतम वेतन दिया जाए. याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुजारियों और कर्मचारियों को राज्य की ओर से निर्धारित न्यूनतम वेतन (unskilled और semi‑skilled श्रमिकों के बराबर) भी नहीं दिया जा रहा. उन्होंने इसे व्यवस्थित शोषण बताया था.
सरकार पर आरोप
याचिका में कहा गया कि राज्य, एंडॉवमेंट विभाग के माध्यम से खुद को आदर्श नियोक्ता (model employer) के रूप में पेश करता है,
लेकिन वास्तव में न्यूनतम वेतन अधिनियम (Minimum Wages Act) और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Article 43) का उल्लंघन कर रहा है.
याचिका में ‘मर्जिनलाइजेशन' का आरोप, दखल की मांग
याचिका में कहा गया कि 2026 के बढ़ते महंगाई स्तर (inflation-adjusted cost of living) के बावजूद पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं देने से उनकी स्थिति और खराब हो रही है.इसी कारण याचिकाकर्ता को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा, ताकि पुजारियों और स्टाफ के और अधिक हाशिए पर जाने (marginalisation) को रोका जा सके.
दक्षिणा पर रोक का भी हवाला
अश्विनी उपाध्याय ने यह भी कहा कि 7 फरवरी 2025 को तमिलनाडु के मदुरै स्थित डंडायुधपानी स्वामी मंदिर में एक सर्कुलर जारी किया गया था जिसमें पुजारियों को आरती की थाली में दक्षिणा लेने से सख्त मना किया गया था. याचिका के अनुसार, इससे पुजारियों की आय का एक अहम स्रोत खत्म हो गया और उनकी आजीविका की अनिश्चित और कमजोर स्थिति उजागर हो गई.
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