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बेल नियम जेल अपवाद, UAPA में भी लागू...उमर खालिद मामले में बड़ी बेंच की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में साफ किया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, और लंबी हिरासत व ट्रायल में देरी की स्थिति में संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए जमानत दी जा सकती है.

बेल नियम जेल अपवाद, UAPA में भी लागू...उमर खालिद मामले में बड़ी बेंच की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट
  • सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को जमानत न देने के फैसले में बड़ी बेंच के सिद्धांतों का पालन न करने पर सवाल उठाए
  • कोर्ट ने कहा कि बेल नियम है और जेल अपवाद, यह सिद्धांत कड़े कानून UAPA में भी समान रूप से लागू होता है
  • जस्टिस BV नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने छोटी बेंच को बड़ी बेंच के फैसलों का पालन करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों में उमर खालिद को जमानत न देने के अपने ही फैसले पर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि उमर खालिद को जमानत न देने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के फैसले का पालन नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, और यह सिद्धांत UAPA जैसे कड़े कानूनों में भी लागू होता है. अदालत ने पांच साल से नार्को-टेरर गतिविधियों में शामिल होने के आरोपी को जमानत दी है.जस्टिस BV नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि गुरमिंदर सिंह और दिल्ली दंगों पर गुलफिशां फातिमा से जुड़े फैसले तीन जजों की बेंच के K.A. नजीब के बाध्यकारी सिद्धांतों से अलग नहीं जा सकते.

छोटी बेंच बड़ी बेंच के फैसले नहीं कर सकती कमजोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि छोटी बेंचें बड़ी बेंच के फैसलों को कमजोर नहीं कर सकतीं. अदालत ने स्पष्ट किया कि कम संख्या वाली बेंच, बड़ी बेंच के फैसले से बंधी होती है. यदि किसी फैसले पर संदेह हो तो मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए. छोटी बेंच किसी बड़े फैसले को कमजोर, दरकिनार या असम्मान नहीं कर सकती. कोर्ट ने कहा कि “KA नजीब” फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी हो और आरोपी लंबे समय से जेल में हो, तो संवैधानिक अदालतें जमानत दे सकती हैं, भले ही UAPA लागू हो. यदि असहमति हो तो मामला केवल CJI को बड़ी बेंच गठित करने के लिए भेजा जा सकता है.

बेल नियम और जेल अपवाद, यह सिद्धांत UAPA मामलों में भी लागू

UAPA की धारा 43D(5) का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता. अदालत ने दोहराया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, और यह सिद्धांत UAPA मामलों में भी लागू होता है. कोर्ट ने कहा कि “ट्विन-प्रोंग टेस्ट”, जिसे गुरमिंदर फैसले में विकसित किया गया था, न तो सीधे UAPA की धारा 43D(5) से निकलता है और न ही K.A. नजीब के फैसले से. अदालत ने चेतावनी दी कि यदि केवल पहली नजर में आरोपों के आधार पर जमानत लगातार रोकी जाती है, तो ट्रायल से पहले की हिरासत “सजा” जैसी बन सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबी अवधि तक मुकदमा लंबित रहने और आरोपी के वर्षों तक जेल में रहने की स्थिति में अदालतों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी.

जस्टिस भुइयां ने NCRB के आंकड़ों का जिक्र कर क्या कहा

अदालत ने नारको टेरर के एक आरोपी की जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की. आरोपी पर नार्को-टेरर गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है और वह पिछले 5 वर्षों से हिरासत में है. अदालत ने कहा कि यह मामला अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और UAPA की धारा 43D(5) के बीच संतुलन से जुड़ा अहम सवाल उठाता है. जस्टिस भुइयां ने अपने फैसले में NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि UAPA मामलों में सजा की दर बेहद कम है. उन्होंने कहा कि 2019 से 2023 के बीच पूरे देश में UAPA मामलों में दोषसिद्धि की दर न्यूनतम 1.5% और अधिकतम लगभग 4% रही.

जम्मू-कश्मीर में 2019 में दोषसिद्धि रेट शून्य था और 2022 में सबसे अधिक केवल 0.89% दर्ज किया गया. कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरे भारत में UAPA मामलों में 94% से 98% तक आरोपियों के बरी होने की संभावना रहती है. जम्मू-कश्मीर में यह संभावना लगभग 99% तक है. बेंच ने इस संदर्भ में लंबी हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे पर चिंता जताई.

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