सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में बंद कैदियों के लिए बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा कि बुजुर्ग और गंभीर बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए राज्य तीन महीने में नीति बनाएं. अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे तीन महीने के अंदर ऐसी नीति तैयार करें, जिसके तहत 70 साल से ज्यादा उम्र के गंभीर बीमारी से पीड़ित, गंभीर रूप से बीमार और शारीरिक रूप से अक्षम कैदियों को मानवीय आधार पर समयपूर्व रिहाई मिल सके.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया, जिसमें ऐसे कैदियों की दया और मानवीय आधार पर रिहाई के लिए देशभर में एक समान दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों को अपनी नीति SLSA यानी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ परामर्श करके बनानी होगी, जिससे पात्र कैदियों की पहचान और प्रक्रिया में बेहतर तालमेल हो सके.
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UN की गाइडलाइन का जिक्र...
अदालत ने निर्देश दिया है कि नीति में रिहाई के लिए स्पष्ट पात्रता मानदंड तय किए जाएं. आवेदन, जांच और फैसले की पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया बनाई जाए. टर्मिनल इलनेस यानी ऐसी बीमारी जिसे पूरी तरह से ठीक न किया जा सके, की एक समान परिभाषा शामिल की जाए. कोर्ट ने यह भी कहा कि इसके लिए UNODC यानी संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय की गाइडलाइन को आधार बनाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कैदियों की स्वास्थ्य स्थिति का निष्पक्ष आकलन करने के लिए स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाए जाएं. पीठ ने कहा कि किसी भी कैदी को सिर्फ प्रशासनिक देरी की वजह से अपनी जिंदगी के आखिरी दिन या साल जेल में बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. सभी फैसले कारणों के साथ दिए जाएं और वे न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगे.
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कैदियों की होगी समीक्षा!
सुप्रीम कोर्ट ने UTRC यानी अंडरट्रायल रिव्यू कमेटी को भी निर्देश दिया है कि वे वक्त-वक्त पर ऐसे कैदियों के मामलों की समीक्षा करें, जो गंभीर बीमारी, ज्यादा उम्र या शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे हैं और जरूरत पड़ने पर जमानत, पैरोल या सजा में छूट की सिफारिश करें.
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि वक्त से पहले रिहाई की पूरी प्रक्रिया को E-Prisons पोर्टल से जोड़ा जाए, जिससे आवेदन, मेडिकल रिपोर्ट, जेल प्रशासन की रिपोर्ट, मेडिकल बोर्ड की राय और अंतिम फैसले की पूरी जानकारी दर्ज हो सके.
केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को राज्यों को तकनीकी सहायता और डिजिटल व्यवस्था उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं. मामले की अगली सुनवाई 19 जनवरी 2027 को होगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट अपने निर्देशों के पालन की समीक्षा करेगा.
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