- सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमों से संरक्षण देने वाले कानून पर सुनवाई की.
- CJI सूर्य कांत ने इसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया और कहा कि हम परीक्षण करेंगे कि क्या इससे कोई नुकसान हो रहा है.
- याचिकाकर्ता संस्था लोक प्रहरी ने दलील दी कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं दी गई है.
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से जीवन भर संरक्षण देने के कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट वैधता का परीक्षण करने को तैयार है. एनजीओ लोक प्रहरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर कोई रोक नहीं लगाई है.
CJI सूर्य कांत ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. हम मामले का परीक्षण करेंगे कि क्या इस प्रावधान से कोई नुकसान हो रहा है और क्या संविधान की व्यवस्था के तहत ऐसी छूट दी जा सकती है. उन्होंने कहा कि फिलहाल स्टे की जरूरत नहीं है.
अदालत से प्रावधान पर रोक लगाने की मांग
याचिकाकर्ता संस्था लोक प्रहरी ने दलील दी कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं दी गई है. उन्होंने कहा कि संसद में कानून पर बहस के दौरान मंत्री ने खुद कहा था कि यह विधेयक केवल सेवा शर्तों से संबंधित है. ऐसे में आपराधिक अभियोजन से छूट को सेवा शर्त नहीं माना जा सकता है.
याचिका में यह भी कहा गया कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को नुकसान पहुंचाता है. याचिकाकर्ता ने अदालत से इस प्रावधान पर तुरंत रोक लगाने की मांग की थी.
2023 में कानून में किया गया था संशोधन
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए मुकदमों से प्रोटेक्शन दिए जाने को लेकर कानून मे संशोधन किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
कानून में संशोधन 2023 में किया गया था, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को ये संरक्षण दिया गया है कि उनके आधिकारिक काम को लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है.
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