- सुप्रीम कोर्ट ने लिफ्ट हादसे में निर्माता, रखरखाव एजेंसी और भवन प्रबंधन को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया है
- ओटिस एलिवेटर कंपनी की अपील खारिज कर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के मुआवजा आदेश को बरकरार रखा गया
- 2003 में रॉ मुख्यालय की लिफ्ट हादसे में पूर्व राजनयिक विपिन हांडा की मौत पर तीनों पक्षों को मुआवजा देना होगा
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी भी लिफ्ट (एलिवेटर) में हादसा होने पर लिफ्ट बनाने वाली कंपनी, उसका रखरखाव करने वाली एजेंसी और जिस भवन में लिफ्ट लगी है उसके मालिक/प्रबंधन, तीनों संयुक्त रूप से यात्रियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होंगे. अदालत ने लिफ्ट को “कॉमन कैरियर” (सार्वजनिक परिवहन साधन) की श्रेणी में माना और कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इन सभी की सर्वोच्च जिम्मेदारी है. जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने ओटिस एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NDRC) के 2014 के आदेश को बरकरार रखा.
यह मामला 2003 में रॉ (RAW) मुख्यालय में लिफ्ट हादसे में पूर्व भारतीय राजनयिक विपिन हांडा की मौत से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट ने हांडा की पत्नी और दो बच्चों को ₹3.01 करोड़ का मुआवजा देने के NDRC के आदेश को सही ठहराया. इसके साथ 20 मार्च 2003 (हादसे की तारीख) से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 90 दिन के भीतर भुगतान नहीं होने पर 12 प्रतिशत ब्याज देने का भी निर्देश बरकरार रखा. अदालत ने NDRC को इस आदेश को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का भी निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि लिफ्ट में प्रवेश करने के बाद यात्री अपनी सुरक्षा पूरी तरह उस प्रणाली के भरोसे छोड़ देता है, इसलिए लिफ्ट निर्माता, रखरखाव एजेंसी और भवन प्रबंधन पर अधिक जिम्मेदारी बनती है.
पीठ ने कहा कि किसी हादसे के बाद उपभोक्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पहले यह तय करे कि किसकी कितनी गलती थी. पीड़ित किसी भी जिम्मेदार पक्ष से पूरा मुआवजा मांग सकता है और बाद में संबंधित पक्ष आपस में अपनी जिम्मेदारी तय कर सकते हैं.
पूर्व राजनयिक विपिन हांडा की हो गई थी मौत
दरअसल, 20 मार्च 2003 को नई दिल्ली स्थित रॉ मुख्यालय में 13 अधिकारी लिफ्ट से नीचे आ रहे थे. लिफ्ट छठी और सातवीं मंजिल के बीच फंस गई. बचाव अभियान के दौरान जब पूर्व राजनयिक विपिन हांडा आधे बाहर निकल चुके थे, तभी लिफ्ट अचानक नीचे खिसक गई और उनका सिर लिफ्ट व फर्श के बीच फंस गया, जिससे उनकी मौत हो गई. अन्य 11 लोगों को बाद में सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया.
सुनवाई के दौरान ओटिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हादसा बचाव कार्य के दौरान मानवीय गलती से हुआ. कंपनी ने यह भी कहा कि उसने पहले ही वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की समस्या बताते हुए 50 केवीए स्टेबलाइजर लगाने की सलाह दी थी, लेकिन उसे नहीं लगाया गया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हादसे को केवल तत्काल कारण से नहीं देखा जा सकता. रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि लिफ्ट में लंबे समय से लगातार खराबियां आ रही थीं और ओटिस को इसकी पूरी जानकारी थी. इसके बावजूद कंपनी ने न तो जरूरी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए और न ही लिफ्ट को असुरक्षित घोषित किया.
अदालत ने माना कि मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) ने रखरखाव कार्यों की उचित निगरानी नहीं की, जबकि RAW ने भवन के उपयोगकर्ता और प्रबंधन के रूप में लगातार मिल रही शिकायतों के बावजूद आवश्यक कदम नहीं उठाए. इसी आधार पर अदालत ने NDRC द्वारा तय की गई जिम्मेदारी को बरकरार रखा कि एलिवेटर कंपनी: 70%, मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES): 25%, RAW (RAW): 5% भुगतान करेगी.
बता दें कि शहरी क्षेत्रों में जगह की कमी के कारण अब शहर क्षैतिज (चारों ओर फैलने) के बजाय ऊर्ध्वाधर (ऊंचाई की ओर) विकसित हो रहे हैं. ऐसे में लिफ्ट आधुनिक शहरी जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं. लोग एक छोटे से स्टील के केबिन में प्रवेश करते हैं, दरवाजे बंद हो जाते हैं और कुछ क्षणों के लिए वे अपनी पूरी सुरक्षा एक ऐसी यांत्रिक व्यवस्था के भरोसे छोड़ देते हैं, जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता. भीड़भाड़ वाली लिफ्ट, खासकर सार्वजनिक स्थानों पर, लोगों में घुटन का एहसास पैदा कर सकती है. भारी हवा, निजी स्थान का अभाव और मंजिलों के बीच लटके होने का एहसास स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है. ऐसे में लिफ्ट का हल्का-सा झटका, अचानक रुक जाना या मशीन से आने वाली कोई असामान्य आवाज भी लोगों के मन में डर पैदा कर सकती है. यह हर यात्री को याद दिलाती है कि सुरक्षा केवल एक अपेक्षा नहीं, बल्कि हर लिफ्ट द्वारा दी जाने वाली एक बुनियादी गारंटी है.
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