- सुप्रीम कोर्ट ने संभल की जामा मस्जिद सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मस्जिद सर्वे के लिए सिविल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी थी
- दावा है कि ट्रायल कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुने बिना जल्दबाजी में सर्वे कमिश्नर नियुक्त कर एकतरफा आदेश दिया था
संभल की जामा मस्जिद का सर्वे कानूनी रूप से सही था या फिर ट्रायल कोर्ट का जल्दबाजी में लिया गया एकतरफा फैसला था? अब इस पर देश की सबसे बड़ी अदालत अपना आखिरी फैसला सुनाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे से जुड़े आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला शुक्रवार को सुरक्षित रख लिया.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस पर सुनवाई कर रही थी. जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने दो याचिकाएं दायर की थीं. इन याचिकाओं में इलाहाबाद हाई कोर्ट के 19 मई 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सर्वे के लिए सिविल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए सर्वे के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की याचिका को खारिज कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के इसी आदेश को चुनौती दी गई है. शुक्रवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद 2024 में दायर एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है. हिंदू पक्ष का दावा है कि संभल की जामा मस्जिद मुगल शासक बाबर ने 1526 में हरिहर मंदिर को गिराकर बनवाई थी. इसी दावे के आधार पर उन्होंने मस्जिद में धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार मांगा और परिसर के सर्वे की मांग की.
ट्रायल कोर्ट ने 19 नवंबर 2024 को एकतरफा आदेश पारित करते हुए स्थानीय जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था.
बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मई 2025 के अपने फैसले में इस आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि मुकदमा 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत प्रतिबंधित है.
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किस दलील पर सुरक्षित रख लिया फैसला?
सुनवाई के दौरान मस्जिद समिति की ओर से सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी और वकील निजाम पाशा ने अपनी दलीलें रखीं. हिंदू पक्ष की ओर से वकील हरि शंकर जैन पेश हुए, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने पक्ष रखा.
सुनवाई के दौरान जामा मस्जिद समिति के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी दलील यह दी कि संभल की ट्रायल कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया और स्थापित नियमों की पूरी तरह अनदेखी की है.
मस्जिद समिति का आरोप है कि ट्रायल कोर्ट ने केवल हिंदू पक्ष की अर्जी दाखिल होने के चंद घंटों के भीतर, बिना मुस्लिम पक्ष को नोटिस जारी किए या उनका पक्ष सुने, उसी दिन सर्वे कमिश्नर नियुक्त करने का एकतरफा आदेश पारित कर दिया था.
मस्जिद समिति ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए जल्दबाजी में उठाया गया कदम करार दिया है.
अब आगे क्या?
सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अब अदालत बाद की तारीख में अपना निर्णय सुनाएगी.
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