Supreme Court Decision: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि इंडियन बैंक एसोसिएशन केवल आरोपों के आधार पर किसी पैनल वकील का नाम ‘कॉशन लिस्ट'में डालकर उसे प्रभावी रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकता. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला उस वकील की याचिका पर सुनाया, जिसकी याचिका को पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की तर्ज पर नेशनल लीगल एकेडमी फॉर एडवोकेट्स की स्थापना करें ताकि अधिवक्ताओं के लिए सतत विधिक शिक्षा को संस्थागत रूप दिया जा सके. ये मामला सिंडिकेट बैंक (अब कैनरा बैंक) से जुड़ा है. बैंक का आरोप था कि उसके पैनल वकील ने एक संपत्ति की सर्च और टाइटल रिपोर्ट तैयार करते समय लापरवाही बरती. आरोप के अनुसार, वकील ने अपनी कानूनी राय में यह उल्लेख नहीं किया कि संपत्ति का एक हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका था, जिससे बैंक को वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा.
इसके बाद 5 फरवरी 2020 को जारी IBA की ‘कौशन लिस्ट' में वकील का नाम शामिल कर दिया गया. वकील का कहना था कि यह कार्रवाई बिना नोटिस दिए, बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए और बिना निष्पक्ष जांच के की गई.उनका यह भी दावा था कि सूची में नाम आने के बाद कई बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने उन्हें अपने पैनल से हटा दिया, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ प्रतिष्ठा की भी क्षति हुई.
सुनवाई के दौरान अदालत के नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने दलील दी कि किसी वकील के खिलाफ पेशेवर कदाचार की कार्रवाई करने का अधिकार केवल बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिलों को है. इस दलील का समर्थन BCI और केंद्र सरकार की ओर से भी किया गया. सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने बार और राज्य बार काउंसिलों द्वारा पेशेवर कदाचार के मामलों के निपटारे की मौजूदा व्यवस्था पर भी चिंता व्यक्त की थी.
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