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अमेरिका में 9 तो ब्रिटेन में 12... फिर भारत में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी?

जो सुप्रीम कोर्ट 8 जजों की साथ शुरू हुई थी, उसमें अब 38 जज होंगे. जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल लोकसभा से पास हो गया है. अभी सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस को मिलाकर 34 जज थे.

अमेरिका में 9 तो ब्रिटेन में 12... फिर भारत में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी?
2019 के बाद अब फिर सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ी है. (सांकेतिक तस्वीर)
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल लोकसभा में पास हो गया है. अगर यह कानून बनता है तो सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी. इनमें एक चीफ जस्टिस भी होंगे. 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट बनी थी, तब इसमें चीफ जस्टिस समेत 8 जज थे. 76 साल बाद जजों की संख्या बढ़कर 38 होने वाली है.

केंद्र सरकार ने जजों की संख्या बढ़ाने वाला जो बिल लोकसभा में पास किया है, वह उस अध्यादेश की जगह लेगा जिसे सरकार मई में लेकर आई थी. मई में ही सरकार ने जजों की संख्या बढ़ाने वाले बिल को मंजूरी दे दी थी, लेकिन इसके बाद सरकार अध्यादेश लेकर आ गई थी. इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की नियुक्ति की गई.

अध्यादेश की अवधि 6 महीने होती है, लेकिन संसद का सत्र शुरू हो जाने पर इसे 6 हफ्ते के भीतर कानून के रूप में पास करना जरूरी होता है, वरना यह खत्म हो जाता है.

कब-कब बढ़ी जजों की संख्या?

सुप्रीम कोर्ट में कई बार जजों की संख्या बढ़ाई गई है. 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट बनी थी, तब 8 जज थे. उसके बाद 1956 में जजों की संख्या बढ़ाकर 11 की गई. 1960 में बढ़कर 14 हुई और 1977 में इसे बढ़ाकर 18 कर दिया गया.

सबसे ज्यादा बढ़ोतरी 1986 में हुई थी, तब सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 18 से बढ़ाकर सीधे 26 कर दी गई थी. फिर 2008 में इसे बढ़ाकर 31 कर दिया गया.

मोदी सरकार में जजों की संख्या दूसरी बार बढ़ाई जा रही है. 2019 में सरकार ने जजों की संख्या बढ़ाकर 34 की थी और अब 38 कर दी है. अब सुप्रीम कोर्ट में एक चीफ जस्टिस और 37 जज होंगे.

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लेकिन इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

प्रस्तावित बिल के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है, क्योंकि अदालत में मामलों के दाखिल होने और उनके निपटारे के बीच लगातार अंतर बना हुआ है.

जजों की संख्या इसलिए बढ़ाना जरूरी था, ताकि मुकदमों का बोझ कम किया जा सके. 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 65,615 मामलों का निपटारा किया था, जबकि 75,410 नए मामले दर्ज किए गए थे. 

बिल में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग केसेस के भारी बोझ से निपटने के लिए जजों की संख्या बढ़ाना जरूरी है. 

इसमें कहा गया है कि इससे चीफ जस्टिस के लिए यह भी मुमकिन हो जाएगा कि वे अहम मुकदमों की सुनवाई के लिए रेगुलर और संवैधानिक बेंच बना सकेंगे.

सुप्रीम कोर्ट में कितने मुकदमे पेंडिंग?

सुप्रीम कोर्ट में 95 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं. इनमें से हजारों केस हैं जो दशकों से सुप्रीम कोर्ट में अटके हुए हैं. 

नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) पोर्टल पर मौजूद डेटा के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में अभी 95,390 मामले पेंडिंग हैं. इसमें से 10,870 केस 5 से 10 साल से सुप्रीम कोर्ट में अटके हैं. जबकि 7,850 मामले ऐसे हैं जो 10 से 20 साल पुराने हैं. 20 से 30 साल पुराने 525 केस अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहे हैं. इतना ही नहीं, 24 मामले तो ऐसे हैं जो 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं.

सुप्रीम कोर्ट में जितने मामले अभी पेंडिंग हैं, उनमें से 73,826 सिविल और 21,564 क्रिमिनल केस हैं. अब इनमें से 36,698 मामले तो ऐसे हैं जो एक साल पहले ही सुप्रीम कोर्ट में आए हैं.

NJDG का डेटा बताता है कि सुप्रीम कोर्ट में इस साल 46,723 नए मामले आए हैं, जबकि अदालत ने 43,399 यानी लगभग 93% केस का निपटारा कर दिया है. निपटारा तेजी से हो रहा है लेकिन नए केस आने के कारण पेंडेंसी का बोझ बढ़ता जा रहा है.

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जजों पर कितना बोझ?

मुकदमों का बोझ बढ़ने के कारण जजों पर केस निपटाने का बड़ा बोझ होता है. पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने 65,615 मामलों का निपटारा किया था. इस हिसाब से हर एक जज ने पिछले साल औसतन 1,929 मामलों का निपटारा किया.

जुलाई 2022 में किरेन रिजिजू ने कहा था कि ब्रिटेन में हर जज रोजाना 4 से 5 मामलों को सुनते हैं, लेकिन भारतीय अदालतों में हर जज हर रोज औसतन 40 से 50 मामलों की सुनवाई करते हैं. उन्होंने कहा था कि जो लोग न्याय में देरी के लिए जजों पर टिप्पणी करते हैं, वे सोच भी नहीं सकते कि एक जज को कितना काम करना पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस चेलामेश्वर ने 2018 में NDTV को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में हर साल औसतन 120 मामलों में फैसला देते हैं, जबकि भारतीय सुप्रीम कोर्ट के जज हर साल औसतन 1,000 से 1,500 मामलों पर फैसला सुनाते हैं.

दिलचस्प बात ये है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 9 जज हैं. लेकिन यहां की सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ चुनिंदा मामलों की ही सुनवाई ही होती है. जबकि, ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट में 12 जज हैं.

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