- CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में तकनीक अपनाने के साथ उसकी सीमाओं की समझ जरूरी बताई.
- न्यायिक अधिकारियों से उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग घबराए बिना सतर्कता के साथ करना चाहिए.
- उन्होंने बताया कि एआई केवल सहायक के रूप में इस्तेमाल हो, न्याय के मूल मानवीय तत्व बनाए रखें.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को आगाह करते हुए कहा कि न्यायपालिका में तकनीक को अपनाने के साथ-साथ इसकी अंतर्निहित सीमाओं की स्पष्ट समझ होनी चाहिए. उन्होंने न्यायिक अधिकारियों से अनुरोध किया कि वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से ‘‘घबराएं'' नहीं, बल्कि सतर्कता के साथ इसका इस्तेमाल करें.
CJI सूर्यकांत ने जोर दिया कि तकनीक का इस्तेमाल केवल एक सहायक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि एक विकल्प के रूप में. उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल संतुलन के साथ होना चाहिए जिससे काम की गति और दक्षता बढ़े, लेकिन साथ ही न्याय के मूल सिद्धांत में मानवीय बुद्धि, अनुभव और संवैधानिक विवेक को पूरी तरह संरक्षित किया जाना चाहिए.
प्रधान न्यायाधीश कर्नाटक राज्य न्यायिक अधिकारी संघ द्वारा आयोजित न्यायिक अधिकारियों के 22वें द्विवार्षिक राज्य स्तरीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, जिसका विषय ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में न्यायपालिका की पुनर्कल्पना' था.
आपको एआई को लेकर घबराना नहीं चाहिए : CJI सूर्यकांत
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आपको एआई को लेकर घबराना नहीं चाहिए. जब आपके सामने कोई ऐसा मामला आता है जिसमें बहुत जटिल तथ्य और कानून के पेचीदा सवाल शामिल हों, तो आप क्या करते हैं? ऐसे मामलों में निर्णय लेते समय व्यक्ति ज्यादा गहराई से सोचता है, धैर्य रखता है और अंत में निर्णय लेने पर उसे संतोष की भावना भी महसूस होती है.''
उन्होंने कहा, ‘‘जब हम एआई प्रौद्योगिकी का उपयोग सावधानी और जागरूकता के साथ करना शुरू करेंगे, तो यही परिणाम देखने को मिलेगा, बशर्ते यह सुनिश्चित किया जाये कि आपके भीतर का न्यायाधीश स्वतंत्र बना रहे और तकनीक से प्रभावित न हो.''
इस कार्यक्रम में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, तथा कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विभू बखरू समेत अन्य लोग उपस्थित थे.
'न्यायपालिका के समक्ष एक अवसर हैं और चुनौती, दोनों ही'
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि एआई के आने से न्यायपालिका के समक्ष एक तरफ नये अवसर हैं और दूसरी तरफ कुछ चुनौतियां भी हैं. उन्होंने कहा कि एआई कई कामों में मदद कर सकता है, जैसे कानूनी शोध करना, मामलों का प्रबंधन आसान बनाना, बड़े डाटा को व्यवस्थित करना और न्यायाधीशों के प्रशासनिक काम का बोझ कम करना. उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक तेज और कुशल हो सकती है.
उन्होंने आगाह किया कि न्यायपालिका में तकनीक को अपनाने के साथ-साथ इसकी अंतर्निहित सीमाओं की स्पष्ट समझ होनी चाहिए. प्रधान न्यायाधीश ने ऐसी प्रणालियों द्वारा उत्पन्न होने वाली अशुद्धियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल में एआई मंचों द्वारा मनगढ़ंत मिसालें, गलत उद्धरण और पूरी तरह से काल्पनिक कानूनी प्रस्ताव तैयार किए जाने के उदाहरण सामने आए हैं.
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘ये तथाकथित ‘‘भ्रामक जानकारी'' मामूली तकनीकी खामियां नहीं हैं. ये न्यायिक प्रक्रिया की बुनियाद पर ही प्रहार करती हैं, जो सटीकता, प्रामाणिकता और विश्वास पर टिकी है. अगर इन पर रोक नहीं लगाई गई, तो ये गुमराह कर सकती हैं, कानूनी दलीलों को तोड़-मरोड़ सकती हैं और परिणामों को गलत दिशा दे सकती हैं.'' प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी मूल पहचान को खोए बिना कितनी अच्छी तरह बदलावों के अनुसार खुद को ढाल पाती है. उन्होंने कहा, ‘‘इसके लिए लगातार सीखने, आत्मचिंतन और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है.''
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