सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल (Justice Sanjay Karol) शनिवार को सेवानिवृत्त हो गए. सब लोग प्यार से उनको ' चाचाजी ' बुलाते रहे. उसके दो कारण थे एक तो युवा वकीलों के प्रति उनका लगाव, जिसके चलते उन्होंने करीब 500 युवा वकीलों को अलग- अलग केसों में एमिक्स क्यूरी बनाया और दूसरा कारण उनका गेट अप जो एक कॉमिक्स 'चाचा चौधरी' से मिलता है. हिमाचल प्रदेश के पहले हेरिटेज गांव गरली से आने वाले जस्टिस करोल को युवा वकीलों के प्रति उनके प्रोत्साहन और सहज व्यवहार के कारण माना जाता रहा. उनके न्यायिक जीवन की प्रमुख उपलब्धियों में गृहिणियों के घरेलू काम के आर्थिक मूल्य को मान्यता देने वाला ऐतिहासिक फैसला शामिल है, जिसमें उन्होंने फैसला दिया कि गृहिणियों को होम मेकर कहा जाना चाहिए और जरूरत पड़े तो उनके काम को कम से कम 30 हजार रुपये महीना आंकना चाहिए.
घरेलू महिलाओं के सम्मान पर सुनाया था ऐतिहासिक फैसला
दरअसल, 11 जून 2026 को दिए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में जस्टिस करोल ने सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाली एक महिला के घरेलू योगदान का आर्थिक मूल्य 30 हजार रुपये प्रतिमाह माना था. कोर्ट ने इसी आधार पर मृतका के परिजनों को 63 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जबकि हाईकोर्ट ने 8 लाख रुपये मुआवजा तय किया था. फैसले में घरेलू काम और बच्चों के पालन-पोषण में महिलाओं के योगदान को व्यापक सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखा गया था. जस्टिस करोल ने कहा था कि महिलाओं का योगदान केवल जैविक प्रजनन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे उस ‘मानव पूंजी' के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिस पर देश की आर्थिक प्रगति निर्भर करती है.
रेलवे किसी यात्री को सेकंड क्लास न कहें- जस्टिस करोल
जस्टिस करोल ने ही फैसला दिया कि रेलवे को किसी यात्री को सेकेंड क्लास नहीं कहना चाहिए. उनके विदाई समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायमूर्ति करोल की संवेदनशीलता का बखान किया. उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश रहते एक सुबह जस्टिस करोल ने सड़क किनारे एक दूधवाले को अचानक गिरते देखा तो उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी, उसकी मदद की और उसे अस्पताल पहुंचाकर उपचार सुनिश्चित कराया.प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस करोल ने मुकदमों की फाइलों पर लगातार ध्यान देने और खुद कुछ अहम मुकदमे संभालने के जरिए 10 महीनों के भीतर लंबित मामलों की संख्या 60,000 से घटाकर 27,000 से कम कर दी थी.जस्टिस करोल ने 8 मार्च 2007 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था.बाद में वे 14 नवंबर 2018 को त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. इसके बाद वे पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे.

जज से भी फैसले में गलती हो सकती है- विदाई समारोह में बोले जस्टिस करोल
विदाई के मौके पर जस्टिस करोल ने कहा कि वकीलों को समझना चाहिए कि असली निखार कोर्ट रूम के अंदर आता है, बाहर नहीं. मैंने जो कुछ भी किया, जिंदगी को पूरी ठाठ-बाट के साथ जिया. मुझे कोई पछतावा नहीं है.उन्होंने ये भी कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे भी फैसले में गलती हो सकती है. न्यायाधीश के तौर पर काम करने के लिए कुछ हद तक विनम्रता और हर वादी के पीछे छिपे वास्तविक इंसान को देखने की क्षमता जरूरी है. कोविड-19 महामारी के दौरान पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था भी कराई थी.जस्टिस करोल की विदाई के साथ उनका न्यायिक कार्यकाल समाप्त हो गया, लेकिन गृहिणियों के श्रम को आर्थिक योगदान के रूप में पहचान देने वाला उनका फैसला उनकी महत्वपूर्ण न्यायिक विरासत के रूप में हमेशा याद किया जाएगा.
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