उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर एक बार फिर 'संत रविदास नगर' (संत रविदास नगर भदोही) करने की घोषणा की है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही में आयोजित एक कार्यक्रम (कारपेट एक्सपो) के दौरान यह आधिकारिक ऐलान किया है. ये ऐलान तब हुआ है जब आने वाले कुछ महीनों के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं. ये चुनाव के लिहाज से अहम कदम भी माना जा रहा है. बीजेपी समेत सभी दल इस चुनाव में दलित वोट बैंक को साधने में जुटे हैं. ऐसे में दलित समुदाय में संत रविदास के नाम पर बड़े वोट बैंक को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
कब-कब इस जिले का बदला गया नाम?
- भदोही वाराणसी से सटा एक जिला है. इसे 1994 में वाराणसी से अलग करके नया जिला बनाया गया था. तब इसका नाम भदोही रखा गया था.
- पहली बार ये जिला 30 जून 1994 को अस्तित्व में आया.
- फिर मायावती पहली बार यूपी की मुख्यमंत्री बनी. ये सरकार 3 जून 1995 से 18 अक्टूबर 1995 तक कुछ महीनों के लिए थी. तब उन्होंने भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया.
- फिर साल 2002 में मुलायम सिंह यादव एक बार फिर से सत्ता में आए और एक बार फिर से संत रविदास नगर का नाम बदलकर दोबारा भदोही कर दिया गया.
- इसके बाद साल 2007 में बहुजन समाज पार्टी पहली बार पूर्ण बहुमत पाकर सत्ता में आई. मायावती ने पद संभालते ही भदोही जिले का नाम एक बार फिर से बदल दिया और यह जिला संत रविदास नगर के नाम से जाना जाने लगा.
- 2012 में सत्ता में आने के बाद समाजपार्टी के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साल 2014 में दोबारा जिले का नाम भदोही रख दिया.
- इसके बाद से अब तक जिले का नाम भदोही ही है.
क्यों रखा गया संत रविदास नगर नाम?
बीजेपी ने इस साल संत रविदास की 650वीं जयंती के लिए समरसता संकल्प अभियान किया है. इसके कार्यक्रम में सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि भदोही फिर से संत रविदास नगर के तौर पर जाना जाएगा. हम इस कार्य को पूरा करेंगे.
लेकिन सवाल है कि आखिर संत रविदास का इस जिले से क्या कनेक्शन है?
दरअसल, संत रविदास (रैदास भी कहा जाता है) 15वीं-16वीं शताब्दी के दौरान महान समाज सुधारक और ज्ञानमार्गी संत हुआ करते थे. संत रविदास को कबीरदास का समसामयिक माना जाता है.
रविदास का जन्म स्थान काशी में सीर गोवर्धपुर में हुआ था. हिंदुओं की बड़ी आस्था का केंद्र होने के वजह से संत रविदास को सम्मान देने के लिए काशी से सटे जिले को संत रविदास नगर रखा गया. इससे दलित राजनीति और वोट बैंक को साधने का अवसर भी मिला.
बीजेपी ने दलित वोट साधने के लिए क्या रणनीति अपनाई है?
उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलित आबादी है जो सभी राजनीतिक दलों के लिए मायने रखती है. मायावती इसी दलित वोटबैंक के सहारे चार बार सीएम की कुर्सी तक पहुंची हैं. ऐसे में अगर बसपा का जनाधार 2027 के यूपी चुनाव में और ज्यादा बिखरता है तो बीजेपी इसका फायदा उठाना चाहती है.
लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (PDA) का फार्मूला तैयार किया है. इससे पार्टी को साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भरसक फायदा भी मिला. अब बीजेपी इस फॉर्मूले के काट के तौर पर दलितों को साधने की रणनीति में पूरी तरह जुटी है.
पार्टी संत रविदास की 650 वीं जयंती को भव्य तरीके से मना रही है. बीजेपी ने दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों का सम्मान कर भी बड़ा सियासी संदेश देने का प्रयास किया है.
वहीं इस साल 6 अप्रैल से लेकर 14 अप्रैल के बीच भी अंबेडकर जयंती पर बीजेपी ने कई कार्यक्रम आयोजित किए थे. इसके अलावा सीएम योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से आंबेडकर की मूर्तियों पर छतरी निर्माण का ऐलान किया है, इसे भी उसी कवायद से जोड़कर देखा जा रहा है.
इसके अलावा बीजेपी ने संगठन में जो हालिया बदलाव किए हैं उसमें भी दलितों को ज्यादा से ज्यादा जगह दी गई है. बीजेपी ने SC मोर्चा में 43 पदाधिकारियों की टीम की नियुक्ति की है. इसके साथ ही यूपी के सभी 6 क्षेत्रों में क्षेत्रीय अध्यक्षों की नियुक्ति भी की है.
यह भी पढ़ें: क्या है सपा के 30 के जवाब में कांग्रेस का 185 वाला ऑफर, कैसे साथ आएंगे 'यूपी के लड़के'?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं