- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की अधिक योग्यता या व्यावसायिक कौशल उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं करता
- दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह पत्नी को मासिक सत्रह हजार रुपये भरण-पोषण के रूप में दे
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति को पत्नी की जीवन-शैली पहले जैसी बनाए रखने का अधिकार सुनिश्चित करना होगा
अदालत ने समय-समय पर यह साबित किया है कि विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि समान अधिकारों और जिम्मेदारियों का बंधन है. जब पति-पत्नी के बीच विवाद अदालत तक पहुंचते हैं, तो अक्सर महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की लड़ाई लड़नी पड़ती है. ऐसे में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले महिलाओं के पक्ष में आए हैं, जिन्होंने न केवल उनके अधिकारों को मजबूत किया, बल्कि न्याय की नई मिसाल भी कायम की. ऐसा ही एक फैसला हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से आया है. जिसमें कहा गया है कि पत्नी का अधिक शिक्षित होना या उसके पास व्यावसायिक कौशल होना मात्र उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता.
आइए जानते हैं पांच ऐसे अहम मामले, जिनमें अदालतों ने स्पष्ट किया कि पत्नी की योग्यता, आय या वैवाहिक स्थिति उसके भरण-पोषण के अधिकार को खत्म नहीं कर सकती.
इलाहाबाद हाईकोर्ट: योग्यता भरण-पोषण रोकने का आधार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी का अधिक शिक्षित होना या उसके पास व्यावसायिक कौशल होना मात्र उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता. न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि पति केवल पत्नी की योग्यता के आधार पर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता.
दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी को मासिक ₹17,000 का भरण-पोषण देने का दिया आदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले में पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि पत्नी की कुछ आमदनी होने से उसकी आर्थिक जरूरतें समाप्त नहीं हो जातीं. कोर्ट ने आदेश दिया कि पति को मासिक ₹17,000 का भरण-पोषण देना होगा. यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि महिला की आय उसके अधिकारों को खत्म नहीं करती.
सुप्रीम कोर्ट: राजनैश बनाम नेहा केस जीवन स्तर बनाए रखना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक मामले में कहा था कि पति को यह सुनिश्चित करना होगा कि पत्नी पहले जैसी जीवन-शैली को जारी रख सके. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की कमाई मात्र होने से भरण-पोषण का दावा निरस्त नहीं होता.
सुप्रीम कोर्ट: को-हेबिटेशन न होने पर भी भरण-पोषण का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि यदि पति को conjugal rights का डिग्री मिल भी जाए, तो भी पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं होता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला को आर्थिक सुरक्षा देना पति की जिम्मेदारी है, चाहे वह साथ रह रही हो या नहीं.
सुप्रीम कोर्ट: जायज़ कारण से अलग रहने पर भी अधिकार बरकरार
‘रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी किसी जायज़ कारण से पति के साथ नहीं रह रही है, तो भी उसे भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि restitution of conjugal rights का आदेश महिला के अधिकारों को खत्म नहीं करता.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं