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1,300 करोड़ की धोखाधड़ी, 80 FIR और अधूरा पड़ा 'वेनिस मॉल' प्रोजेक्ट... SC ने रद्द की सतिंदर सिंह भसीन की जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट घोटाले में प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन की जमानत रद्द कर दी. कोर्ट ने प्रोजेक्ट को रहने लायक न मानते हुए निवेशकों से हुई भारी धोखाधड़ी को गंभीर आर्थिक अपराध कहा.

1,300 करोड़ की धोखाधड़ी, 80 FIR और अधूरा पड़ा 'वेनिस मॉल' प्रोजेक्ट... SC ने रद्द की सतिंदर सिंह भसीन की जमानत
  • सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट के प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन की जमानत रद्द कर दी है.
  • भसीन पर लगभग ₹1,300 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप है और उनके खिलाफ 80 से ज्यादा FIR दर्ज हैं.
  • सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त समिति ने ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट को उपयोग और कब्जे के लिए अयोग्य घोषित किया है.
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के बहुचर्चित ‘ग्रैंड वेनिस' रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से जुड़े बड़े घोटाले में प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन को बड़ा झटका देते हुए उनकी जमानत रद्द कर दी है. भसीन पर करीब ₹1,300 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप है और उनके खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में 80 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हैं. यह आदेश जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने सुनाया.

अदालत ने पाया कि भसीन ने हजारों निवेशकों को ऑफिस स्पेस, दुकानें और एक होटल देने का वादा किया था, लेकिन हकीकत में प्रोजेक्ट में बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव है. आरोप है कि जिस प्रोजेक्ट में निवेश कराया गया, वहां लिफ्ट, सीढ़ियां, एयर कंडीशनिंग, शौचालय और अग्नि सुरक्षा जैसी अनिवार्य सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. इसके बावजूद निवेशकों से प्रीमियम दरों पर भारी रकम वसूली गई.

SC ने अयोग्य करार दिया था प्रोजेक्ट

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त दो सदस्यीय स्वतंत्र समिति ने पहले ही ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट को उपयोग और कब्जे के लिए अयोग्य करार दिया था. समिति में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता अध्यक्ष के रूप में और वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली सदस्य के रूप में शामिल थीं. समिति की रिपोर्ट, जो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई, में कहा गया कि यह प्रोजेक्ट पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से अधूरा पड़ा है और इसमें करीब ₹1,000 करोड़ से अधिक निवेशकों की राशि फंसी हुई है.

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समिति ने डेवलपर कंपनी को बताया लापरवाह

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि ग्राउंड फ्लोर पर स्थित एक मॉल ही फिलहाल चालू है, जबकि बाकी ढांचे अधूरे हैं और उन्हें न तो कानूनी मंजूरी मिली है और न ही वे रहने या व्यावसायिक उपयोग के योग्य हैं. समिति ने डेवलपर कंपनी Bhasin Infotech and Infrastructure Private Limited (BIIPL) के आचरण को बड़े पैमाने पर लापरवाह और गैर‑जिम्मेदाराना बताया.

समिति ने तकनीकी जांच के लिए अनंत कुमार, पूर्व स्पेशल डायरेक्टर जनरल (CPWD) और पूर्व PWD इंजीनियर‑इन‑चीफ की सेवाएं लीं. उनकी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में सामने आया कि निर्माण स्थल पर स्वीकृत नक्शों और वास्तविक निर्माण के बीच गंभीर विचलन हैं. 15 मंजिला प्रोजेक्ट में अभी तक 15वीं मंजिल का निर्माण नहीं हुआ है, जबकि 9वीं से 14वीं मंजिल तक कोई पार्टीशन वॉल मौजूद नहीं है, जिससे अलग‑अलग यूनिट्स की पहचान भी संभव नहीं हो पाती.

सेफ्टी क्लियरेंस से ज्यादा है मॉल की ऊंचाई

तकनीकी रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि प्रोजेक्ट के लिए जो फायर सेफ्टी क्लियरेंस 25 जुलाई 2025 को लिया गया था, वह सिर्फ 57.15 मीटर ऊंचाई (आठवीं मंजिल) तक ही मान्य है, जबकि पूरी इमारत इससे कहीं अधिक ऊंची प्रस्तावित है. अनंत कुमार ने समिति को बताया कि मौजूदा स्थिति में यह प्रोजेक्ट न तो पूरा है और न ही वैधानिक और सुरक्षा मानकों को पूरा करता है.

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समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, BIIPL ने वर्ष 2010 में निवेशकों से ₹6,500 से ₹10,000 प्रति वर्ग फुट की दर से प्रीमियम कीमत वसूली. करीब 75 प्रतिशत अलॉटियों ने कुल राशि का लगभग 90 प्रतिशत तक भुगतान कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद आज तक उन्हें न तो यूनिट्स का कब्जा मिला और न ही प्रोजेक्ट के पूरा होने की कोई ठोस समयसीमा दिखाई दी. इसी वजह से बड़ी संख्या में निवेशकों ने कंपनी और उसके प्रमोटर सतिंदर सिंह भसीन के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए.

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए माना कि आरोपों की गंभीरता, निवेशकों की भारी संख्या, लंबे समय से अधूरा पड़ा प्रोजेक्ट और अदालत द्वारा नियुक्त पैनल की निष्कर्षात्मक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि मामले को हल्के में नहीं लिया जा सकता. अदालत का मानना था कि इस स्तर के गंभीर आर्थिक अपराध में आरोपी को जमानत पर रखना न्याय के हित में नहीं है.

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यह फैसला ग्रेटर नोएडा के ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट में फंसे हजारों निवेशकों के लिए एक अहम मोड़ माना जा रहा है और रियल एस्टेट सेक्टर में जवाबदेही तय करने की दिशा में इसे एक सख्त और निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है.

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