कहते हैं ना... कि 'वक्त जब करवट लेता है, तो मुकद्दर भी सिर झुका देता है'. ये कहानी है एक ऐसे आदमी की, जिसे दुनिया ने सिरे से खारिज कर दिया था... जिसे लोगों ने ताने मारे कि 'तुमसे न हो पाएगा'... किश्त न भर पाने के कारण गुंडे उसकी स्कूटी तक उठाकर ले गए. सिर पर 14 करोड़ का ऐसा भारी भरकम कर्ज था कि लोगों ने यहां तक कह दिया था... 'तुम्हें जिंदा रहने का हक नहीं है'. आज वो शख्स 800 करोड़ की कंपनी का मालिक है. बात 1 सितंबर साल 2000 की है. दिल्ली के करोल बाग की एक पुरानी सी, सीलन भरी बिल्डिंग. तीसरा फ्लोर, और ऑफिस नंबर 306. संजय भसीन अपने भाई के साथ इस दरवाजे के बाहर खड़े थे. उन्होंने ताला खोला और अंदर कदम रखा. एक पुराना सा पंखा था, और इधर-उधर से जुगाड़ करके लाया गया एक कंप्यूटर. ऑफिस भले ही 375 स्क्वायर फुट का एक छोटा सा डिब्बा था, लेकिन भाई... इन दोनों की आंखों में पल रहे सपने आसमान से भी बड़े थे.
उनका सपना था- 'दुनिया को इंडिया घुमाना'. सिर्फ इमारतें या कुतुब मीनार नहीं... बल्कि दुनिया को हिंदुस्तान की रूह से मिलाना. उसके जायके, उसके त्योहारों और उसके जज्बात से मिलाना.
शुरुआत बहुत धीमी थी. इंटरनेट स्लो था, लेकिन लड़कों का जज्बा फुल स्पीड पर था. एक वेबसाइट बनाई. मेहनत रंग लाई और 2004 आते-आते काम ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि उन्होंने वो छोटा सा ऑफिस भी खरीद लिया और आसपास के तीन और ऑफिस भी. 2006 तक तो उन्होंने राजेंद्र नगर में अपना खुद का मकान भी ले लिया. सब कुछ सही चल रहा था. तभी आया साल 2007.

गूगल ने बदली पॉलिसी, सब कुछ खत्म?
संजय भसीन ने सोचा, चलो अब कुछ बड़ा करते हैं. इंटरनेशनल के साथ-साथ इंडियन मार्केट में भी उतरते हैं. फ्लाइट्स, होटल, वीजा... सब कुछ बेचना शुरू कर दिया. टीवी और अखबारों में ऐड दिए, ऑटो के पीछे पोस्टर चिपकाए. और इस सबके लिए बैंकों से लाखों-करोड़ों का कर्ज ले लिया.
लेकिन, किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. 2007 के आखिर में Google ने अपनी पॉलिसी बदली, और सब कुछ ताश के पत्तों की तरह ढह गया. रातों-रात इंटरनेशनल बिजनेस ठप. जो मुनाफा संजय को आसमान पर ले गया था. 2010 आते-आते हालात इतने बदतर हो गए कि हर दिन चार लाख रुपये का नुकसान होने लगा. सिर पर 14 करोड़ का भारी भरकम कर्जा. सैकड़ों देनदार रोज ऑफिस के चक्कर काटने लगे.
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शक्ल छिपानी पड़ी, नीलामी का नोटिस आया
सोचिए उस आदमी पर क्या बीतती होगी, जिसे अपनी शक्ल छिपा कर चलना पड़े? घर में गाड़ी उठाने वाले गुंडे आ जाएं, लोग बेइज्जती करें. वो 100-100 लोगों की भीड़, जो अपनी टिकट के लिए ऑफिस में हंगामा कर रही हो. भागने का कोई रास्ता नहीं. घर गिरवी रख दिया, वो ऑफिस जो पसीने से सींचा था, वो भी किसी और के नाम कर दिया. बैंक ने घर के बाहर नीलामी का नोटिस चिपका दिया.
यूटयूब वीडियो से बदली जिंदगी!
लेकिन कहते हैं न, 'डूबते को तिनके का सहारा'! एक दिन YouTube पर एक वीडियो देखा. 'If you have to change your life, you have to change yourself.' (अगर जिंदगी बदलनी है, तो खुद को बदलना होगा). उस एक लाइन ने, मानो सोए हुए शेर को जगा दिया. संजय भसीन ने कंप्लेंट करना छोड़ा और राजेंद्र नगर में एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोल लिया. आईएएस की तैयारी कर रहे बच्चों को टिफिन बांटने लगे. स्टाफ के नाम पर एक सेकंड-हैंड स्कूटी ली, जिसकी 2500 रुपये किश्त जाती थी. दिन-रात एक कर दिया.
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लेकिन 2016 में एक ऐसा दिन आया, जब वो 2500 की किश्त भी नहीं चुका पाए. गुंडे आए और वो स्कूटी भी छीन ले गए. उस दिन, उस टूटे हुए इंसान ने आसमान की तरफ देखकर एक जिद ठान ली- 'अब और नीचे नहीं गिरूंगा. अब जो भी गाड़ी लूंगा... मर्सिडीज लूंगा, और वो भी कैश पर.'
और फिर, उसने लिया एक आखिरी रिस्क. 'बैक टू बेसिक्स'. उसने दिल्ली, आगरा और जयपुर का एक ऐसा टूर डिजाइन किया, जो सिर्फ साइट-सीइंग नहीं था. वो एक 'स्पिरिचुअल ट्रांसफॉर्मेशन' था. सुबह ताजमहल देखने से पहले विदेशी टूरिस्ट्स को 'मेडिटेशन' और 'माइंडसेट' की क्लास दी जाने लगी. उसने उन्हें 'इंडिया' नहीं दिखाया, उसने उन्हें 'खुद से' मिलवाया.
फिर जादू हो गया. टूर ऐसा सुपरहिट हुआ कि 40 डिग्री की चुभती गर्मी में भी अमेरिका से बसें भर-भर कर आने लगीं. वो विदेशी टूरिस्ट्स उस इंसान के लिए खड़े होकर तालियां बजा रहे थे, जिसके पास कल तक अपनी स्कूटी की किश्त भरने के पैसे नहीं थे.

कहानी का क्लाइमेक्स
2020 का कोविड आया, दुनिया ठप हो गई, बड़ी कंपनियों ने लोगों को निकाल दिया. लेकिन इस शख्स ने अपने एक भी कर्मचारी को नहीं निकाला. 2023 तक सारा कर्जा चुकता. आज गुड़गांव में अपना आलीशान घर है, द्वारका और दुबई में शानदार ऑफिस है. उनकी कंपनी 'कल्चर हॉलिडेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' आज एक 'ग्लोबल ब्रांड' बन चुकी है. 2024 में अमेरिका में 'बेस्ट टूर ऑपरेटर' का अवॉर्ड जीता है. आज उसकी वैल्यूएशन है 800 करोड़ रुपए.
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