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संभल हिंसा केस में सरकार से सुप्रीम कोर्ट का सवाल, क्या हिरासत में कबूलनामे के आधार पर लग सकता है NSA?

संभल हिंसा मामले में NSA के तहत आरोपी की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से अहम सवाल पूछे हैं. कोर्ट ने जानना चाहा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया जा सकता है. मामले में मुल्ला अफरोज की याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है.

संभल हिंसा केस में सरकार से सुप्रीम कोर्ट का सवाल, क्या हिरासत में कबूलनामे के आधार पर लग सकता है NSA?
  • SC ने संभल हिंसा मामले में NSA के तहत हिरासत की कानूनी वैधता और कबूलनामे की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए.
  • आरोपी मुल्ला अफरोज ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की.
  • न्यायालय ने पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को निवारक हिरासत का आधार माना जा सकता है या नहीं.

संभल हिंसा मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई एक आरोपी की हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं. अदालत ने जानना चाहा है कि क्या पुलिस हिरासत में कथित रूप से दिए गए कबूलनामे को किसी व्यक्ति के खिलाफ निवारक हिरासत का आधार बनाया जा सकता है. इस मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कबूलनामे की कानूनी वैधता और उसकी प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाए. सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.

संभल हिंसा मामले में हो रही है सुनवाई

मामला नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा से जुड़ा है. यह हिंसा शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के निर्देश पर कराए जा रहे सर्वे के बाद भड़की थी. घटना में चार लोगों की मौत हुई थी. इस मामले में मुल्ला अफरोज को कथित मास्टरमाइंड बताया गया है, जिसने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है.

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया अहम कानूनी सवाल

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखा जा सकता है. अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या ऐसा बयान अधिकारियों की उस “विषयगत संतुष्टि” का आधार बन सकता है, जिसके आधार पर NSA के तहत कार्रवाई की जाती है.

गिरफ्तारी और NSA की कार्रवाई का क्रम

याचिकाकर्ता के अनुसार, घटना के करीब 54 दिन बाद उसे पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर गिरफ्तार किया था. बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उसे जमानत भी मिल गई थी. हालांकि इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत हिरासत का आदेश जारी कर दिया.

हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने पर पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

हिरासत आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने NSA के तहत जारी आदेश को बरकरार रखा. इसके बाद आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हिरासत को गैरकानूनी बताते हुए राहत की मांग की.

याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता. हिरासत का आदेश जारी करने के लिए ठोस और विश्वसनीय सामग्री होना जरूरी है. याचिकाकर्ता का कहना है कि केवल आशंका के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि कोई व्यक्ति भविष्य में भी अपराध करेगा.

पुराने फैसलों का भी दिया हवाला

याचिकाकर्ता ने अदालत में पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि निवारक हिरासत जैसे कड़े कदम के लिए केवल संभावनाओं या आशंकाओं के बजाय ठोस साक्ष्यों की आवश्यकता होती है. बिना पर्याप्त आधार के किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता.

पुलिस की भूमिका पर भी उठाए सवाल

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि संभल हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोलीबारी की थी और इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई. उसने अदालत से इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति देने की भी मांग की है. मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है.  

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