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CJP आंदोलन का अध्ययन करें युवा, 'अराजकता के व्याकरण' से सतर्क रहने की आवश्यकता: RSS

अतुल लिमये के मुताबिक, अगर CJP प्रोटेस्ट के मंच से दिए गए भाषणों, नारों और शामिल लोगों के बैकग्राउंड की स्टडी किया जाए तो कई उत्तरहीन सवाल सामने आते हैं.

CJP आंदोलन का अध्ययन करें युवा, 'अराजकता के व्याकरण' से सतर्क रहने की आवश्यकता: RSS
सह सरकार्यवाह अतुल लिमये ने सीजेपी प्रोटेस्ट पर कई सवाल उठाए हैं. (Photo: IANS)
  • अतुल लिमये ने कहा कि CJP आंदोलन को सिर्फ घटना न मानें, उसकी कार्यपद्धति, नेटवर्क और विचारधारा समझें.
  • संघ नेता ने ग्राम्शी और आंबेडकर का हवाला देकर युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में लगाने की अपील की.
  • अतुल लिमये ने सवाल उठाया कि कुछ मंचों से हिंदू-विरोधी स्वर क्यों सुनाई दिए?
नई दिल्ली:

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अतुल लिमये ने देश के युवाओं से हालिया 'CJP आंदोलन' का गहराई से केस स्टडी करने को कहा है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नजरिए से काम करने वाले संगठनों की भूमिका आज के समय में ज्यादा अहम हो गई है. महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित ABVP के प्रोग्राम में छात्रों को संबोधित करते हुए अतुल लिमये ने जंतर-मंतर पर हुए CJP के प्रदर्शन पर विस्तार से बात रखी. उन्होंने कहा कि युवाओं को किसी भी आंदोलन को सिर्फ एक तात्कालिक घटना मानकर देखने के बजाय उसके पीछे की पूरी प्रक्रिया, कार्यपद्धति, समर्थन तंत्र और वैचारिक नजरिए को समझने की जरूरत है.

अतुल लिमये के मुताबिक, जब CJP से जुड़ा आंदोलन सामने आया, तब यह और ज्यादा साफ हो गया कि युवाओं के बीच राष्ट्रीय नजरिए से काम करने वाले संगठनों की उपस्थिति कितनी जरूरी है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस आंदोलन को समझने के लिए इसके घटनाक्रम, कार्यपद्धति, समर्थन तंत्र, नेटवर्क, नए प्रयोग और इसके पीछे सक्रिय विचारधारा का तटस्थता से एनालिसिस करना होगा.

'कैसे बढ़ा सीजेपी का समर्थन...'

अतुल लिमये आगे कहा, "अभिजीत दीपके ने सबसे पहले ऑनलाइन माध्यम से CJP की शुरुआत की थी. शुरुआती दो-तीन दिनों में इसे अच्छा समर्थन मिला, जिसके बाद वे 6 जून को वे भारत आए और 7 जून से आंदोलन की शुरुआत की." हालांकि, 7 जून से 19 जून तक वे देश के कई शहरों में गए, लेकिन अभिजीत को उम्मीद के मुताबिक जनसमर्थन नहीं मिला.

अतुल लिमये ने कहा कि 20 जून से जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना शुरू हुआ, तब से इस आंदोलन का स्वरूप अचानक बदलने लगा. उन्होंने सवाल उठाया कि यह बदलाव आखिर कैसे आया? इसका उत्तर आंदोलन से जुड़ी संस्थाओं और संगठनों की डिटेल्ड लिस्ट देखने पर मिलता है, जिससे इसके पीछे काम कर रहे समर्थन तंत्र की परतें खुलती हैं.

यह मुख्य रूप से युवाओं और विद्यार्थियों का आंदोलन था, इसलिए AISA और SFI जैसे कई वामपंथी छात्र संगठन इसमें सक्रिय रूप से जुड़े. इसके अलावा, मानवाधिकार, आदिवासी, महिला, मुस्लिम, ईसाई, किसान, मजदूर, पर्यावरण, पत्रकारिता और विधिक सहायता से जुड़े अनेक संगठनों ने भी इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग लिया.

अतुल ने सवाल उठाते हुए कहा कि इतने विविध और अलग-अलग क्षेत्रों के संगठनों को एक ही मंच पर लाने का काम आखिर किसने किया? इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली को समझे बिना आंदोलन के असली मकसद को नहीं समझा जा सकता.

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'आंदोलन का समर्थन विदेशों तक कैसे पहुंचा?'

अतुल लिमये के मुताबिक, अगर आंदोलन के मंच से दिए गए भाषणों, नारों और उसमें शामिल लोगों की बैकग्राउंड का अध्ययन किया जाए, तो कई ऐसे उत्तरहीन सवाल सामने आते हैं, जिनका विश्लेषण जरूरी है. उन्होंने सवाल उठाया कि कुछ मंचों से हिंदू-विरोधी स्वर क्यों सुनाई दिए? विवादास्पद और देशविरोधी नारे लगाने वाले या उनका समर्थन करने वाले लोग वहां क्यों उपस्थित थे? आंदोलन के अंदर वामपंथी विचारधारा का प्रभाव अचानक कैसे बढ़ गया? तमाम राजनीतिक दल और उनके हित इससे कैसे जुड़ते चले गए? एक शुद्ध छात्र आंदोलन देखते ही देखते सियासी आंदोलन में कैसे बदल गया? पूरे देश में एक जैसी गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों का तालमेल किस तरह बिठाया गया? इस आंदोलन का विस्तार और समर्थन विदेशों तक कैसे पहुंचा? 

अतुल लिमये के मुताबिक, भारतीय संस्कृति महिलाओं को मातृ भाव से देखने की शिक्षा देती है लेकिन आंदोलन में इसके उलट भाषा और व्यवहार देखने को मिला. उन्होंने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के एक कथन का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था- "भविष्य का लोकतंत्र केवल संसद नहीं, बल्कि सड़कें तय करेंगी. केवल चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिरोध तय करेगा." 

अतुल लिमये ने कहा कि इस कथन के पीछे छिपी वैचारिक सोच को समझना बहुत जरूरी है. यद्यपि किसी आंदोलन की शुरुआत किसी वास्तविक या स्थानीय समस्या से हो सकती है, लेकिन बाद में उसका नेतृत्व और नियंत्रण किन शक्तियों के हाथ में चला जाता है, इसका विश्लेषण करना बेहद जरूरी है. वामपंथी विचारधारा ऐसे आंदोलनों को वैकल्पिक राजनीति का सफल मॉडल मानती है.

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'ग्रामर ऑफ एनार्की' का जिक्र...

संबोधन के दौरान संघ के सह सरकार्यवाह ने इतालवी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी के 'कल्चरल हेगेमनी' के सिद्धांत का जिक्र किया. इस विचार के मुताबिक, सिर्फ आर्थिक संघर्ष पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी जाती है. इसके लिए 'डीकंस्ट्रक्शन' जैसे सिद्धांतों का सहारा लेकर स्थापित प्रतीकों पर सवाल उठाए जाते हैं.

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को दिए गए आखिरी ऐतिहासिक भाषण को करते हुए अतुल लिमये ने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में केवल संवैधानिक तरीकों को अपनाने पर बल दिया था. उन्होंने असंवैधानिक या हिंसक आंदोलनों से सतर्क रहने की चेतावनी देते हुए इसे 'ग्रामर ऑफ एनार्की' यानी अराजकता का व्याकरण कहा था.

अतुल लिमये ने जोर देते हुए कहा, "अगर भारत को एक विकसित और सशक्त राष्ट्र बनाना है, तो युवाओं की अपार ऊर्जा का सही और सकारात्मक दिशा में नियोजन होना चाहिए. युवाओं के अंदर राष्ट्रभक्ति, सेवा, सामाजिक दायित्व और नेतृत्व के संस्कार गढ़ना समय की मांग है. ऐसे आंदोलनों का जवाब सिर्फ विरोध या आलोचना करना नहीं है, बल्कि युवाओं के साथ लगातार सकारात्मक संवाद कायम करना, राष्ट्रभावना जगाना और समाज-निर्माण के कार्यों का व्यापक विस्तार करना ही सबसे प्रभावी समाधान है."

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