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पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल पर जेपीसी में पड़ी फूट, क्यों नहीं आ सकी रिपोर्ट? इनसाइड स्टोरी

बैठक में काफ़ी नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला. गृह मंत्रालय और क़ानून तथा विधायी मामलों के मंत्रालयों के अधिकारियों ने समिति को ब्रीफ़ किया. इसके बाद कई मुद्दों पर समिति की बैठक में चर्चा हुई. जब रिपोर्ट पारित करने की बात आई तो अचानक यह मांग उठी कि हर सिफारिश पर मतदान कराया जाए.

पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल पर जेपीसी में पड़ी फूट, क्यों नहीं आ सकी रिपोर्ट? इनसाइड स्टोरी
  • पीएम-सीएम को 30 दिन से अधिक हिरासत में रहने पर पद छिनने वाला संविधान संशोधन बिल JPC में अटका हुआ है
  • संसद के मॉनसून सत्र में यह बिल प्राथमिकता में नहीं है, सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयकों पर जोर देगी
  • विपक्षी दलों ने इस बिल को विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने वाला और संघवाद विरोधी बताया है
नई दिल्ली:

तीस दिन से अधिक की हिरासत में होने पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की कुर्सी अपने आप छिनने के प्रावधान का 'संविधान संशोधन विधेयक' अटक गया है. इसके लिए बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति में शुक्रवार को रिपोर्ट मंजूर नहीं की जा सकी. विपक्ष की नाम मात्र की उपस्थिति के बावजूद समिति में रिपोर्ट को लेकर मतभेद दिखे, जिसके बाद इस पर और अधिक चर्चा की बात कही गई है.

सरकार के आला सूत्रों ने बताया कि सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मॉनसून सत्र में यह बिल प्राथमिकता में नहीं है. सरकार की प्राथमिकता दो अध्यादेशों को क़ानून में बदलने वाले और तीन नए विधेयकों को पारित कराना है. साथ ही, सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर जोर देगी. इसके लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को छोड़ कर बाक़ी सभी विपक्षी दलों का समर्थन मिलने की उम्मीद दिख रही है. इसके लिए सरकार यह प्रावधान करने को तैयार है, जिसमें लोकसभा और सभी विधानसभाओं की सीटें पचास प्रतिशत बढ़ाने की बात होगी.

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सूत्रों के अनुसार पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल से विपक्षी दलों में खटास आ रही थी और इसके कारण परिसीमन बिल पर समर्थन मिलने में परेशानी आ सकती थी. विपक्ष कहता आया है कि तीस दिन से अधिक की हिरासत पर कुर्सी जाने का बिल सरकार विपक्षी दलों के नेताओं को निशाना बनाने के लिए लाई है. वे इसे संघवाद के भी खिलाफ बता रहे हैं. यही कारण है कि एनसीपी-एसपी, एआईएमआईएम और वायएसआरसीपी को छोड़कर बाक़ी सभी विपक्षी दलों ने जेपीसी का बहिष्कार किया था.

31 सदस्यीय इस समिति में अकाली दल की ओर से हरसिमरत कौर भी शामिल हुईं थीं, जिन्होंने बाद में इस्तीफ़ा दे दिया था. समिति में शामिल एनसीपी-एसपी की सुप्रिया सुले और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने रिपोर्ट पर असहमति का नोट दिया था. लेकिन जब यह तय हो गया कि रिपोर्ट नहीं आ रही है, तब इन दोनों ने नोट वापस ले लिया.

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इससे पहले बैठक में काफ़ी नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला. समिति ने दो महत्वपूर्ण और तीन सामान्य सिफ़ारिशें करने का फ़ैसला किया था. शुक्रवार सुबह साढ़े दस बजे जब बैठक शुरू हुई थी, तब गृह मंत्रालय और क़ानून तथा विधायी मामलों के मंत्रालयों के अधिकारियों ने समिति को ब्रीफ़ किया. इसके बाद कई मुद्दों पर समिति की बैठक में चर्चा हुई. जब रिपोर्ट पारित करने की बात आई तो अचानक यह मांग उठी कि हर सिफारिश पर मतदान कराया जाए.

पहली सिफारिश थी कि ‘हटाने' के स्थान पर ‘निलंबन' लिखा जाए. दूसरी सिफारिश थी कि केवल ऐसे गंभीर अपराधों के मामलों में तीस दिन से अधिक हिरासत में रहने पर कार्रवाई हो जहां पांच साल या उससे अधिक की सज़ा का प्रावधान हो.

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कुछ सदस्यों ने इन सिफारिशों का विरोध किया. उन्होंने इसे संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ बताया. इस पर मतदान की मांग भी उठा दी गई. सूत्रों के अनुसार जब पहली दो सिफारिशों पर मतदान हुआ तो सत्ता पक्ष के कुछ सदस्यों ने भी विरोध में वोट डाल दिया. हालांकि इसके बावजूद वे पारित हो गईं थीं. इसके बाद तीसरी सिफारिश पर चर्चा के समय समिति की अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने फ़ोन पर संदेश मिलने के बाद रिपोर्ट न लाने का फैसला किया.

अब एक तरह से पीएम-सीएम को हटाने वाला बिल ठंडे बस्ते में चला गया है. विपक्ष के एक सांसद ने कहा कि सरकार इसे ट्रायल बैलून की तरह इस्तेमाल कर रही थी. वह विपक्षी मंसूबों को परखना चाह रही थी. अब इसे न लाकर वह उन विपक्षी दलों को भी संदेश दे रही है जो इसके दुरुपयोग को लेकर आशंकित थीं. ऐसा कर सरकार उन्हें परिसीमन और महिला आरक्षण वाले संविधान के 131वें संशोधन विधेयक पर समर्थन के लिए साथ ला सकती है.

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