Reverse Wedding: ओडिशा के क्योंझर जिले में एक ऐसी शादी देखने को मिली जिसने हर किसी को हैरान कर दिया. यहां परंपरा पूरी तरह उलट गई दूल्हा बारात लेकर नहीं आया, बल्कि दुल्हन खुद बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंची. शादी के बाद जहां आमतौर पर दुल्हन की विदाई होती है, वहीं इस शादी में दूल्हे की विदाई हुई और वह ‘घर जमाई' बनकर दुल्हन के साथ उसके घर चला गया. यह अनोखा नजारा पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है.
यह मामला क्योंझर जिले के तेलकोई ब्लॉक के चामुंडा गांव का है. यहां दुल्हन लक्ष्मी देहुरी अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ पूरे रीति-रिवाज और खुशी के माहौल में दूल्हे के घर पहुंची. दूल्हे का परिवार भी इस अनोखी बारात का स्वागत करने के लिए तैयार था. सभी रस्में उसी तरह निभाई गईं, जैसे आम शादी में होती हैं बस फर्क इतना था कि बारात दुल्हन की थी.
मंडप में विवाह, फिर बदली विदाई की परंपरा
दूल्हे के घर मंडप सजा, पंडित ने मंत्र पढ़े और सात फेरे भी पूरे हुए. शादी पूरी तरह पारंपरिक तरीके से ही संपन्न कराई गई. लेकिन असली हैरानी तब हुई जब विदाई का समय आया. यहां दुल्हन नहीं, बल्कि दूल्हे को विदा किया गया. उसे घर बसाने के लिए बर्तन, फर्नीचर और अन्य जरूरी सामान दिया गया और वह दुल्हन के साथ उसके घर के लिए रवाना हुआ.
घर जमाई के लिए परिवार ने निकाला नया रास्ता
दरअसल, लक्ष्मी के परिवार में बेटा नहीं है. पिता राया देहुरी की दो बेटियां हैं और वे चाहते थे कि शादी के बाद कोई दामाद उनके साथ रहकर उनका सहारा बने. इसी इच्छा के चलते उन्होंने ऐसा रिश्ता तलाशा, जिसमें दूल्हा ‘घर जमाई' बनकर रहने को तैयार हो. हालांकि शुरुआत में दूल्हे का परिवार इसके लिए राजी नहीं था. बाद में दोनों पक्षों ने मिलकर यह बीच का रास्ता निकाला कि शादी दूल्हे के घर होगी, लेकिन उसके बाद वह दुल्हन के साथ उसके घर जाकर रहेगा.
पंडित और गांव वाले भी रह गए हैरान
इस शादी को कराने वाले पंडित ने भी माना कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार ऐसी शादी देखी. उन्होंने बताया कि सभी वैदिक रस्में पूरी तरह निभाई गईं फेरे, सिंदूर, मंगलसूत्र सब कुछ हुआ, बस शादी का ढंग अलग था. गांव के लोगों के लिए भी यह पहली बार था, जब उन्होंने ऐसी शादी देखी. इसलिए पूरे इलाके में इसे लेकर खासा उत्साह और चर्चा रही.
समाज के लिए एक नई मिसाल
यह शादी केवल एक अलग घटना नहीं, बल्कि एक संदेश भी दे रही है. पहला, बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता अगर बेटा नहीं है तो दामाद भी बेटे की तरह जिम्मेदारी निभा सकता है. दूसरा, ‘घर जमाई' को लेकर जो झिझक होती है, उसे तोड़ने की कोशिश की गई है. तीसरा, परंपराओं को बदले बिना भी उन्हें समय के अनुसार ढाला जा सकता है.
अब कैसा रहेगा नया जीवन?
अब दूल्हा बसंत प्रधान, ‘घर जमाई' के तौर पर लक्ष्मी के साथ रायगोड़ा गांव में रहेगा. दोनों परिवार इस फैसले से संतुष्ट नजर आ रहे हैं और इसे एक सकारात्मक बदलाव मान रहे हैं. दोनों का मानना है कि समाज समय के साथ बदलता है और जरूरत के अनुसार नई परंपराएं भी बनती हैं.
दूल्हे के पिता का भावुक पक्ष
दूल्हे के पिता ने इस मामले पर अपनी भावनाएं भी जाहिर कीं. उन्होंने कहा कि शुरुआत में यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था. उनके मुताबिक, “मैंने सोचा था बेटे की शादी कराऊंगा और उसे घर वापस ले आऊंगा. लेकिन जब सामने से ऐसी शर्त आई कि शादी के बाद बेटे को वहीं रहना होगा, तो मन में दुविधा थी. आखिरकार उनकी बात माननी पड़ी. उम्र के इस पड़ाव पर यह मेरे लिए थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन परिस्थिति के हिसाब से यही फैसला सही लगा.”
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