यह 1999 के कारगिल युद्ध की एक ऐसी अनसुनी दास्तान है, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और एक हिंदुस्तानी होने के नाते आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा. ये किस्सा कर्नल जीवन कुमार सिंह ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर शेयर किया है. बात 24 जुलाई 1999 की है. कारगिल की चोटियों पर युद्ध अपने आखिरी और सबसे निर्णायक दौर में था. 17 गढ़वाल राइफल्स के जांबाज जवान दो बड़े ऑपरेशंस की तैयारी में जुटे थे. तभी अचानक दुश्मन की तरफ से तोपखाना गरज उठा. इसी भारी गोलाबारी के बीच एक गोला सीधे आकर फटा- आर्मी नंबर 4070666P, लांस नायक कृपाल सिंह के ठीक पास.
मंजर इतना खौफनाक था कि पाकिस्तानी तोप के नुकीले छर्रों ने कृपाल सिंह के शरीर को छलनी कर दिया. उनकी एक आंख छिन गई और पेट में ऐसा गहरा घाव लगा कि आंतें तक बाहर आ गईं. हालात बेहद नाजुक थे.
मौत से लड़ता सैनिक
साथियों ने आनन-फानन में फर्स्ट एड दिया, ड्रिप लगाई और उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाकर बेस कैंप की तरफ दौड़ पड़े. लेकिन पहाड़ों का सफर कोई मामूली सड़क का सफर नहीं होता. अस्थाई हेलीपैड वहां से पूरे 6 घंटे की पैदल दूरी पर था. जरा सोचिए उस खौफनाक सफर के बारे में. एक तरफ ऊंची-ऊंची चट्टानें, पत्थरों से भरे संकरे रास्ते, कानों को चीरती गोलियों की गूंज और दूसरी तरफ मौत से जंग लड़ता भारत मां का एक लाल.
रास्ता इतना संकरा था कि स्ट्रेचर उठाने वाले जवानों को चट्टानों से चिपक कर अपना बैलेंस बनाना पड़ रहा था. धीरे-धीरे कृपाल सिंह का खून स्ट्रेचर से रिसकर उनके साथियों के कंधों को भिगोने लगा. पांच घंटे बीतते-बीतते दर्द कम करने वाली मॉर्फिन का असर भी खत्म होने लगा. दर्द ऐसा जिसे सहना किसी इंसान के बस की बात नहीं, वो लेटे-लेटे ही अपने साथियों का हौसला बढ़ा रहे थे.
हेलीपैड बस कुछ ही दूरी पर था. रेस्क्यू के लिए चीता हेलीकॉप्टर अपना इंजन चालू किए इंतजार कर रहा था. तभी अचानक कृपाल सिंह की धीमी सी आवाज आई- "स्ट्रेचर रोक दो, मुझे तुम लोगों से कुछ बात करनी है".

सैनिक ने क्यों रुकवाया स्ट्रेचर?
साथियों ने स्ट्रेचर नीचे रख दिया. दर्द से कराहते हुए कृपाल सिंह ने अपनी छाती की जेब की तरफ इशारा किया और जो कहा, वो हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. उन्होंने कहा, "मेरी जेब में एक छोटी सी डायरी है. इसमें उन जवानों के नाम हैं, जिनसे मैंने पैसे उधार लिए हैं. अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरी जुलाई महीने की तनख्वाह से उनका पैसा लौटा देना. मैं इस दुनिया से किसी का कर्ज लेकर नहीं जाना चाहता."
मौत सामने खड़ी थी, सांसे उखड़ रही थीं. आम इंसान ऐसे वक्त में सिर्फ भगवान या परिवार को याद करता है, लेकिन उस जांबाज के जहन में अपने उसूल और अपने साथियों का हक सबसे ऊपर था. साथियों ने ढांढस बंधाया- "अरे भाई, तुम ठीक हो जाओगे". लेकिन शायद उस सैनिक की किस्मत में मातृभूमि की गोद ही लिखी थी. जैसे ही हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरी, लांस नायक कृपाल सिंह ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं.
सिर्फ 400 की उधारी का दाग नहीं लेना चाहता था सैनिक
आपको जानकर हैरानी होगी कि बाद में जब वो डायरी खोली गई, तो उसमें किसी के 30 रुपये तो किसी के 50 रुपये... कुल मिलाकर सिर्फ 400 रुपये का ही उधार था. लांस नायक कृपाल सिंह की ये शहादत हमें एक बहुत बड़ा सबक दे जाती है. शरीर गोलियों से छलनी हो सकता है, मौत सांसें छीन सकती है, लेकिन एक सच्चे फौजी का सबसे बड़ा हथियार उसकी बंदूक नहीं, उसका बेदाग किरदार होता है. जब तक ऐसे वीर भारत मां की कोख से जन्म लेते रहेंगे, इस देश का तिरंगा हमेशा आसमान चूमता रहेगा.
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