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छह घोड़े, सोने की परत वाली शाही बग्घी... गणतंत्र दिवस पर विदेशी मेहमानों संग राष्ट्रपति ने की शानदार सवारी, जानें इतिहास

Royal Carriage History: गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू विदेशी अतिथियों के साथ शाही बग्घी में सवार होकर समारोह स्थल तक पहुंचीं. इस शाही बग्घी का सैकड़ों साल पुराना इतिहास है.

छह घोड़े, सोने की परत वाली शाही बग्घी... गणतंत्र दिवस पर विदेशी मेहमानों संग राष्ट्रपति ने की शानदार सवारी, जानें इतिहास
Republic day 2026 Shahi Bagghi
नई दिल्ली:

राष्ट्रपति भवन से 77वां गणतंत्र दिवस समारोह शुरू होते ही वो ऐतिहासिक बग्घी भी नजर आई. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ रिपब्लिक डे परेड के मुख्य अतिथि यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेएन कर्तव्य पथ की ओर रवाना हुईं. 1950 के गणतंत्र दिवस के साथ ही ये बग्घी समारोह का हिस्सा रही है, जब भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इस बग्घी पर बैठकर गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने पहुंचे थे. भारत की आजादी से पूर्व वायसराय इस शाही बग्घी का इस्तेमाल करते रहे हैं. 

शाही बग्घी का इतिहास पुराना 

गणतंत्र दिवस समारोह में इस्तेमाल ये शाही बग्घी सैकड़ों साल पुरानी है. इस बग्घी के किनारों पर सोने की परत चढ़ी हुई है. इस बग्घी को आगे खींचने के लिए इसके साथ छह घोड़ों के साथ सारथी के तौर पर सैनिक चलते हैं. राष्ट्रपति की इस शाही बग्घी को ब्रिटिश काल में वायसराय इस्तेमाल शाही सवारी के तौर पर इस्तेमाल करते थे. इसमें राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ भी सोने के साथ अंकित है. इसमें समय-समय पर चार या छह घोड़ों का इस्तेमाल होता है. रिपब्लिक डे, बीटिंग रिट्रीट और कई अन्य सार्वजनिक समारोह में भी इस बग्घी का इस्तेमाल होता है.

काले रंग की शाही बग्घी

काले रंग की इस बग्घी में खास लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है. इसके पहियों के रिम और अन्य जगहों पर सोने का इस्तेमाल किया गया है. इसकी कीमत आज के वक्त करोड़ों रुपये में है. 100 साल से भी पहले अंग्रेजी हुकूमत के दौरान कोलकाता की कंपनी स्टुअर्ट एंड कंपनी ने इसे तैयार किया था.इस शाही बग्घी और इसमें इस्तेमाल घोड़ों की देखरेख राष्ट्रपति के विशेष अंगरक्षक करते हैं.

 शाही बग्घी गणतंत्र दिवस

शाही बग्घी गणतंत्र दिवस

शाही बग्घी ब्रिटिश काल में बनी

भारत और पाकिस्तान का जब 1947 में बंटवारा हुआ तो इस शाही बग्घी को लेकर भी पेंच फंसा. ये बग्घी किसे दी जाए, इसका फैसला सिक्का उछालकर किया गया. भारत के दूत एचएम पटेल औऱ पाकिस्तान के चौधरी मोहम्मद अली ने अन्य चीजों की तरह इस बेशकीमती सामान पर फैसला किया. यहां तक कि राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड भी दो तिहाई भारत और एक तिहाई पाकिस्तान के पक्ष में बांटे गए. जानकारी के मुताबिक, तब के वायसराय (प्रेसिडेंट) के बॉडीगार्ड रेजीमेंट में शामिल लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी फौज के याकूब खान के बीच सिक्का उछाला गया और ये शाही बग्गी भारत के खाते में आ गई. 

Royal Carriage

Royal Carriage

इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या के बाद इस्तेमाल बंद

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जब 1984 में हत्या हुई तो शाही बग्घी का चलन बंद हो गया और उसकी जगह बुलेटप्रूफ कार ने ली. हालांकि वर्ष 2014 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस शाही बग्घी का इस्तेमाल किया. राष्ट्रपति रहे रामनाथ कोविंद ने इसी बग्घी का प्रयोग किया. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी कई सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान बग्घी पर सवार नजर आईं. 

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