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हिमालय में 150 साल बाद मिला नीले-बैंगनी फूलों वाला दुर्लभ पौधा, आयुर्वेद में 'संजीवनी' से कम नहीं

वनस्पति विज्ञानी ने दुर्लभ पौधे को हिमालय की ऊंची चोटियों में खोजा है. 150 साल बाद यह दोबारा नजर में आया है. आयुर्वेद और तिब्बती चिकित्सा पद्धति में यह बहुत लाभकारी है.

हिमालय में 150 साल बाद मिला नीले-बैंगनी फूलों वाला दुर्लभ पौधा, आयुर्वेद में 'संजीवनी' से कम नहीं
Cyananthus hookeri Rare Plant
नई दिल्ली/तवांग:

हिमालय का उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक पूरा इलाका रहस्यमयी दुर्लभ वनस्पतियों, जड़ी-बूटी के खजाने से भरा पड़ा है. ऐसे ही खजाने का एक नायाब हीरा वनस्पति वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है. वनस्पति विज्ञानियों ने 150 साल बाद ऐसे ही एक दुर्लभ पौधे को अरुणाचल की खूबसूरत तवांग घाटी में ढूंढ़ा है. इससे पहले सिक्किम में यह पौधा देखा गया था. इसे सायनेंथस हुकेरी नाम दिया गया है. रतनजोत कुल के इस पौधे की पत्तियों और कलियों पर छोटे-छोटे सफेद मखमली बाल रहते हैं, जो इसे भयानक ठंड, बर्फीली हवा और सूरज की अल्ट्रावॉयलेट (UV) किरणों से बचाते हैं. ऊंचाई वाले इलाकों में कीड़ों और तितलियों को यह फूल आकर्षित करता है.

आयुर्वेद में संजीवनी से कम नहीं

इस कुल के पौधों की जड़ों का इस्तेमाल गहरे लाल, बैंगनी रंग के रूप में किया जाता है. इसका इस्तेमाल शुद्ध आयुर्वेदिक बालों के तेल जैसे रतनजोत के तेल में प्राकृतिक रंग और कंडीशनिंग के लिए होता है. इसकी पत्तियों और जड़ों में सूजन रोधी कम करने वाले और बैक्टीरिया मारने वाले गुण होते हैं. पहाड़ों में इसके लेप का इस्तेमाल चोट, त्वचा में संक्रमण और घावों को तेजी से सुखाने में होता रहा है. इसकी सूखी पत्तियों की चाय या अर्क अंदरूनी सूजन और जोड़ों के दर्द में राहत देता है.

रतनजोत कुल का पौधा

आयुर्वेद और तिब्बती चिकित्सा पद्धति सोवा-रिग्पा में यह असरदार है. यह खूबसूरत नीला-बैंगनी फूल वाला दुर्लभ पौधा बोरागिनेसी परिवार से ताल्लुक रखता है. इसे स्थानीय भाषा में हिमालयन बोरेज रतनजोत कुल का पौधा कहते हैं. यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और कश्मीर में 3 से 5 हजार मीटर ऊंची बर्फीले चट्टानों के बीच उगता है.

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तवांग की चूना घाटी में खोजा गया

अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के मागो गांव में पौधा मिला है. हिमालय में  3600 मीटर की ऊंचाई पर चूना घाटी में वनस्पति विज्ञानियों ने इस पौधे को स्पॉट किया. इसे अंतिम बार 1867 में सिक्किम में देखा गया था और ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक जोसेफ डॉल्टन ने इसे खोजा था. सायनेंथस हुकेरी का नाता कैंपानुलेसी बेलफ्लावर फैमिली से है और यह एक दुर्लभ फूल वाला पौधा है.हिमालय की बर्फीली चोटियों वाले ठंडे इलाके में यह पाया जाता है. इसमें बैंगनी और नीले रंग के चमकीले फूल खिलते हैं, जो घंटी जैसे दिखते हैं. 

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सायनेंथस हुकेरी क्यों खास है? 

वनस्पति विज्ञानियों की मानें तो इस दुर्लभ फूल वाले पौधे की 50 से भी कम प्रजातियां अब अस्तित्व में हैं. 150 साल बाद सानेंथस हुकेरी के खोजे जाने की जानकारी ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ओरिक्स में भी छपी है. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर (IUCN) ने भारत की लुप्तप्राय वनस्पतियों में इसे शामिल किया है. साथ ही इसके संरक्षण के लिए भी सिफारिश की है. 

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