आज देश की एक बेहद कद्दावर महिला नेता और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन, विजयलक्ष्मी पंडित का जन्मदिन है. उनका जन्म 18 अगस्त 1919 में हुआ था. विजयलक्ष्मी यूपी में मंत्री, कई देशों के अलावा संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली राजदूत भी रह चुकी हैं. आज जन्मदिन पर उनकी जिंदगी के उस अनछुए पहलुओं के बारे में बता रहे हैं, जिसे इतिहास ने कहीं पीछे छोड़ दिया है. ये कहानी एक बेइंतहा इश्क, दर्दनाक जुदाई और देश के सबसे ताकतवर परिवार की नाराजगी की है.
साल था 1916. ढाका का रहने वाला एक हैंडसम और पढ़ा-लिखा नौजवान, सैयद हुसैन, इंग्लैंड से वकालत पढ़कर लौटा था. लेकिन उसे कोर्ट-कचहरी रास नहीं आई. उसने चुना पत्रकारिता का रास्ता. बॉम्बे क्रॉनिकल में छपने वाले उनके आग उगलते लेखों ने रातों-रात उन्हें पूरे हिंदुस्तान में मशहूर कर दिया. उनके इस बेखौफ अंदाज पर नजर पड़ी पंडित मोतीलाल नेहरू और महात्मा गांधी की.
सैयद हुसैन की जीवनी के लेखक एनएस विनोद किताब ‘अ फॉरगॉटेन एम्बेसेडर इन काएरो द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ सैयद हुसैन' में लिखते हैं, जनवरी 1919 में कहानी में आता है पहला दिलचस्प मोड़. मोतीलाल नेहरू सैयद की लेखनी के ऐसे मुरीद हुए कि उन्होंने सैयद को अपने अखबार 'द इंडिपेंडेंस' का संपादक बनाकर इलाहाबाद बुला लिया. उस वक्त अखबार का दफ्तर नेहरू परिवार के आलीशान आनंद भवन में ही हुआ करता था.

एक नौजवान, जो देखने में किसी हीरो से कम नहीं, वो आनंद भवन में रह रहा है. यहीं उनकी नजरें मोतीलाल नेहरू की लाडली बेटी विजयलक्ष्मी पंडित से मिलीं. विजयलक्ष्मी को घर में सब प्यार से 'नैन' बुलाते थे. नैन उस वक्त महज 19 साल की एक बेहद खूबसूरत लड़की थीं. सैयद उम्र में उनसे 12 साल बड़े थे, दोनों एक-दूसरे की तरफ खिंचे चले गए.
मुस्लिम रीति-रिवाजों से निकाह, नेहरू परिवार में भूचाल
इश्क परवान चढ़ ही रहा था कि सैयद को एक कॉन्फ्रेंस के लिए लंदन जाना पड़ा. पाकिस्तानी पत्रकार एम अब्बासी के एक लेख के मुताबिक, लंदन जाने से पहले सैयद हुसैन ने विजयलक्ष्मी के साथ गुपचुप तरीके से मुस्लिम रीति-रिवाजों से निकाह कर लिया था. भनक लगते ही नेहरू परिवार में भूचाल आ गया.
जब ये भनक मोतीलाल नेहरू के कानों तक पहुंची, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. वो आग-बबूला हो उठे. भाई जवाहरलाल नेहरू का गुस्सा भी सातवें आसमान पर था. बात इतनी बिगड़ गई कि आखिर में महात्मा गांधी को बीच-बचाव के लिए उतरना पड़ा. गांधी और मोतीलाल नेहरू ने सैयद को घेरा. उन पर सियासी और पारिवारिक दबाव का ऐसा हंटर चला कि ये युवा जोड़ा अपनी शादी तोड़ने पर मजबूर हो गया.

इसके बाद शुरू हुआ जुदाई का दौर, यह किसी वनवास से कम नहीं था. बापू के कहने पर विजयलक्ष्मी को जबरन साबरमती आश्रम भेज दिया गया, जो उस चुलबुली लड़की को एक जेल की तरह लगा. उधर, सैयद हुसैन ने दुखी मन से दिसंबर 1919 में संपादक पद से इस्तीफा दिया और वो जो समंदर पार गए, तो 26 सालों तक भारत की मिट्टी को तरसते रहे. इस बीच विजयलक्ष्मी की शादी महाराष्ट्र के सारस्वत ब्राह्मण रणजीत पंडित से कर दी गई. जबकि सैयद हुसैन ताउम्र अविवाहित रहे.

सालों बाद हुई मुलाकात
26 साल बाद, 1945 में जब विजयलक्ष्मी अमेरिका गईं, तो तकदीर ने इन दोनों पुराने प्रेमियों को फिर आमने-सामने ला खड़ा किया. 1946 में सैयद हुसैन भारत लौट आए, और उस वक्त तक विजयलक्ष्मी के पति का देहांत हो चुका था. और वह यूपी मंत्रीमंडल की सदस्य थीं. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया.
लेकिन शायद इनकी किस्मत में मिलना लिखा ही नहीं था. इस बार दीवार बने खुद देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू. उन्होंने 30 साल पुराने इस किस्से को भुलाया नहीं था. पंडित नेहरू ने विजयलक्ष्मी को भारत का पहला राजदूत बनाकर सोवियत संघ (रूस) भेज दिया और सैयद हुसैन को राजदूत बनाकर मिस्र भेज दिया.

साफ था- न दोनों पास रहेंगे, न मुलाकात होगी. और हुआ भी यही. काहिरा के शेफर्ड होटल में रहते हुए, महज एक साल के भीतर सैयद हुसैन को दिल का दौरा पड़ा और 61 साल की उम्र में इस दुनिया और अपनी अधूरी मोहब्बत को छोड़कर वो हमेशा के लिए रुखसत हो गए.
काहिरा में ही उन्हें दफनाया गया. और इस कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए- जिस नेहरू ने जीते-जी इन दोनों को एक नहीं होने दिया, उसी नेहरू ने 1949 में काहिरा जाकर सैयद हुसैन की कब्र पर फूल चढ़ाए.
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