लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को IDBI बैंक में नियंत्रण हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव की आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में बैंक बनते थे, जबकि मोदी सरकार के दौर में उन्हें बेचा जा रहा है. उन्होंने इस बैंक के कर्मचारियों को अपना समर्थन भी दिया और कहा कि हम आपके साथ खड़े हैं. IDBI कर्मचारियों को लिखे एक लेटर में, राहुल गांधी ने दावा किया कि बैंक के प्राइवेटाइजेशन से कर्मचारियों की सेवा शर्तें कमजोर हो जाएंगी.
राहुल गांधी में लेटर में क्या लिखा?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में, राहुल गांधी ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकिंग के प्रति कांग्रेस और BJP सरकारों के नजरिया की तुलना की. उन्होंने इस प्रस्तावित डील पर सवाल उठाए और IDBI बैंक के कर्मचारियों के प्रति एकजुटता जताई. उन्होंने लिखा, "कांग्रेस के समय में, देश के उद्योगों को खड़ा करने के लिए IDBI की स्थापना की गई थी. मोदी के समय में, पहले बोली लगाई गई और फिर कीमत तय कर दी गई. कांग्रेस के समय में बैंक बनाए जा रहे थे, जबकि मोदी के समय में उन्हें बेचा जा रहा है."
उन्होंने आगे लिखा, "मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं."
कांग्रेस के समय में IDBI बना - देश का उद्योग खड़ा करने के लिए। मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ। कांग्रेस के time पे बैंक बनते थे। मोदी के time में बिकते हैं। मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूँ। https://t.co/uLT7mWTYyr
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) October 30, 2026
सरकार क्या डील कर रही है?
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक में 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को बेचने के लिए 52,878 करोड़ रुपये (5.56 अरब अमेरिकी डॉलर) की डील मंजूरी दी. इस प्रस्तावित सौदे के तहत, सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा. इस बिक्री के बाद, सरकार की हिस्सेदारी घटकर 15 प्रतिशत और LIC की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत रह जाएगी.
इस बीच, वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार को साफ किया कि IDBI बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन के लिए दूसरे दौर की बोली में 'रिजर्व प्राइस' यानी न्यूनतम कीमत को न तो घटाया गया और न ही बढ़ाया गया. लेकिन, प्रक्रिया में बदलाव की वजह से जो बोली आई, उसके दाम में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है.
मंत्रालय ने बताया कि दूसरे दौर की प्रक्रिया, जिसे सबसे अच्छे प्रस्ताव वाला दौर भी कहते हैं, वह 'कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट' यानी CGD ने तय की थी. 'कैबिनेट कमिटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स' यानी CCEA ने इस ग्रुप को यह अधिकार दिया था कि वह प्रक्रिया से जुड़ी दिक्कतों को सुलझा सके और रणनीतिक सौदों को सही तरीके से लागू करने के लिए जरूरी बदलाव कर सके.
प्रक्रिया के बारे में बताते हुए मंत्रालय ने कहा कि पहले दौर की बोली 'डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट' यानी DIPAM के दिशा-निर्देशों के तहत हुई थी. ये दिशा-निर्देश इस तरह के मुश्किल रणनीतिक सौदों में थोड़ी छूट या लचीलापन रखने की इजाजत देते हैं. यह सफाई ऐसे समय में आई है जब IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर काफी सवाल उठ रहे हैं. बैंक के कर्मचारियों ने आरक्षण के नियमों, नौकरी की शर्तों की सुरक्षा और पेंशन के फायदों को लेकर चिंता जताई है.
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