यह ख़बर 02 जुलाई, 2014 को प्रकाशित हुई थी

प्राइम टाइम इंट्रो : न्यायपालिका की आज़ादी में दखलंदाज़ी हुई?

नई दिल्ली:

नमस्कार मैं रवीश कुमार। क्या आपको इस बात से फर्क पड़ता है कि कोई सरकार अपनी संस्थाओं के बीच किस तरह का संतुलन बनाती है और उनकी स्वायत्तता को कितनी जगह देती है। मैं सीबीआई की बात नहीं कर रहा हूं। वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम जज नहीं बने तो जनता को क्यों तकलीफ होनी चाहिए। उनके जज बनने से महंगाई तो कम नहीं हो जाती है। यह निवेदन इसलिए है कि इसी बहाने कार्यपालिका जिसे हिन्दी में सरकार कहते हैं और न्यायपालिका जिसे उर्दू में अदालत कहते हैं के बीच एक जज की नियुक्ति को लेकर जो बहस चल रही है उसमें हर किसी को कूद पड़ना चाहिए।

कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच के नाज़ुक रिश्तों को समझने के लिए। तभी आप या हम इस बात को ढंग से देख पाएंगे कि क्या किसी जज की नियुक्ति इस बात पर भी निर्भर हो सकती है कि सरकार उसे राजनीतिक नज़रिये से कैसे देखती है। आखिर क्यों चीफ जस्टिस को यह कहना पड़ा कि भारत सरकार ने उनके भेजे गए चार नामों में से एक को अलग करने का जो फैसला किया वो उचित नहीं था और एकतरफा तरीके से ऐसा किया गया। बिना मेरी जानकारी और सहमति के ऐसा किया गया। इसके बाद चीफ जस्टिस कहते हैं कि यह धारणा मत बनाइये कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता हो सकता है। मैंने हमेशा इसकी लड़ाई लड़ी है और अगर समझौता हुआ तो मैं कुर्सी छोड़ देने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा। मैं एक अरब बीस करोड़ भारतीयों से वादा करता हूं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा।  

ऐसा क्या हो गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक अरब बीस करोड़ भारतीयों का आह्वान करना पड़ गया। आज की बहस में अंग्रेजी के दो शब्द बार-बार आ सकते हैं।

पहला है कॉलेजियम− इसके अध्यक्ष होते हैं भारत के मुख्य न्यायाधीश और उनके अलावा सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज इसके सदस्य होते हैं। जजों की नियुक्ति यही कॉलेजियम करता है।
दूसरा शब्द है सेग्रिगेशन− इस शब्द का इस्तेमाल इस संदर्भ में आएगा कि क्यों सरकार ने कॉलेजियम के भेजे चार जजों में से एक का नाम अलग कर दिया। अलग मतलब उनकी नियुक्ति का आदेश जारी नहीं किया।

मामला यह है कि भारत सरकार ने गोपाल सुब्रमण्यम के जज बनने के प्रस्ताव की फाइल सेग्रिगेट यानी अलग कर दी और बाकी तीन जजों की नियुक्ति को मंज़ूरी दे दी। उन्हें जज इन वेटिंग बना दिया गया। गोपाल सुब्रमण्यम ने इसे अपनी स्वतंत्रता पेशेवर साख ईमानदारी और निष्ठा पर कुठाराघात यानी हिन्दी में हमले के रूप में देखा। वो इस बात से खफा थे कि 15 मई को आईबी से क्लीन चिट मिल जाने के बाद भी नई सरकार के आते ही उनके बारे में मीडिया में ख़बरें लीक कराईं गई।

इन बातों को लेकर गोपाल साहब ने 25 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक चिट्ठी लिख दी और उसे सार्वजनिक कर दी। 9 पन्ने की इस चिट्ठी के कुछ अंशों का मैंने अपने हिसाब से चयन किया है। जिसमें गोपाल आखिर में कहते हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में जो कुछ हुआ है उससे मेरे मन में गंभीर आशंका पैदा होती है कि सरकार मेरी या न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करेगी। मेरी समझ यह है कि मेरी फाइल कॉलेजियम के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेजी गई। मुझे लगता है कि न्यायपालिका सरकार की पसंद नापसंद का आदर कर अपनी स्वतंत्रता को लेकर अड़ने में नाकाम रही है। अदालत को कम से कम इतना तो करना चाहिए कि मुझमें विश्वास व्यक्त करने जैसा कोई बयान दे। कम से कम अपनी बिरादरी के सदस्यों के साथ तो इंसाफ होना ही चाहिए। अदालत अगर इसमें कामयाब नहीं होती है तो वह रेत के टीले में धंस जाएगी।

28 जून को विदेश से लौटने के बाद चीफ जस्टिस ने सार्वजनिक रूप से यकीन दिलाया है कि न्यायपालिका की आज़ादी से समझौता नहीं होने देंगे। कौन कर रहा था आज़ादी में दखल। चीफ जस्टिस ने तो यह भी कहा कि बिना उनकी रज़ामंदी या जानकारी के सरकार ने गोपाल सुब्रमण्यम की फाइल को अलग किया। जबकि कॉलेजियम ने उत्तम प्रतिभा का चुनाव किया था। क्या यह जवाब गोपाल सुब्रमण्यम के लिए काफी है। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि गोपाल सुब्रमण्यम ने अपनी बात सार्वजनिक कर ठीक नहीं किया है।

6 मई को चार व्यक्तियों के नाम सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए भेजा गया था। लेकिन सरकार बदलते ही मीडिया में खबरें आती हैं कि सरकार ने तीन नामों पर मंज़ूरी दी और गोपाल सुब्रमण्यम की फाइल रोक ली। क्योंकि उनके खिलाफ आईबी और सीबीआई की प्रतिकूल टिप्पणी है। इस खबरबाज़ी से गोपाल सुब्रमण्यम आहत होते हैं और चीफ जस्टिस से संपर्क करते हैं चीफ जस्टिस उन्हें 28 जून तक रुकने के लिए कहते हैं ताकि वे विदेश से लौट आएं।

गोपाल इस खत में लिखते हैं कि अगर नाम वापस नहीं लिया कि उनके साथ के तीन जजों की नियुक्ति संदिग्ध हो जाएगी। वे इस प्रोपैगैंडा से आहत हैं। आईबी ने मुझे 15 मई को क्लीन चीट दे दी थी। मुझे लोगों और कॉलेजियम की निगाह में शंका पैदा करने के लिए बदनाम किया जा रहा है। अगर मुझ पर शक था तो सुप्रीम कोर्ट ने कई नाज़ुक मसलों पर मुझे एमिकस क्यूरे क्यों बनाया। एमिकस क्यूरे को आप हिन्दी में मददगार वकील कह सकते हैं। आईबी और सीबीआई ने मुझे क्यों शीर्ष वकील बनाए रखा। मेरी समझ में सोहराबुद्दीन बनाम गुजरात सरकार जैसे मामलों में सुझाव देने के चलते सरकार निशाना बना रही है। गोपाल ने लिखा है कि सरकार को लगता है कि वे उनकी लाइन पर नहीं चलेंगे।

सरकार ने सूत्रों से बुलवाया कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। पहले भी उम्मीदवारों के नाम अलग किए गए हैं। 2009 में स्वतंत्र कुमार और सीके प्रसाद के नाम का सुझाव आया था तब सिर्फ स्वतंत्र कुमार को ही मंज़ूरी मिली थी। सूत्रों द्वारा प्रचारित इन उदाहरणों की तुलना गोपाल सुब्रमण्यम मामले से की जा सकती है या नहीं यह भी एक सवाल है। जिन जस्टिस सीके प्रसाद का सरकारी सूत्रों ने उदाहरण दिया है उनकी फाइल दिसबंर 2009 में ज़रूर रोकी गई थी, मगर उस फाइल को कॉलेजियम के पास भेजा था। कॉलेजियम अपनी राय पर कायम रहा और फरवरी 2010 में जस्टिस सीके प्रसाद, सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए।

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जस्टिस सीके प्रसाद आज उसी कॉलेजियम के सदस्य हैं जिसने गोपाल सुब्रमण्यम का चुनाव किया था। क्या सरकार ने चीफ जस्टिस या कॉलेजियम से कोई राय मांगी थी क्या सरकार ने राजनीतिक कारणों से किसी को जज बनने से रोक कर न्यायपालिका की आज़ादी में दखलंदाज़ी की है। गोपाल ने नाम वापस ले लिया मगर जो सवाल छोड़ गए हैं क्या वे भी वापस लिये जा सकते हैं। प्राइम टाइम