- ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर विपक्षी नेता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से आज रात आठ बजे मुलाकात करेंगे
- विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस, टीएमसी, एनसी, सीपीएम, एनसीपी, आरजेडी और सपा के नेता शामिल हैं
- CEC को हटाने के लिए संविधान में केवल सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर निष्कासन की व्यवस्था है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर लगातार सड़क पर प्रदर्शन कर रहे विपक्ष के नेताओं को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का समय आज मिल गया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इन नेताओं को आज रात 8 बजे राष्ट्रपति भवन बुलाया है. कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दल पिछले तीन दिनों से लगातार प्रदर्शन कर रहे थे. इसके बाद राष्ट्रपति से आज उनकी ये मुलाकात काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
राष्ट्रपति से मिलने वाला इंडिया गठबंधन का प्रतिनिधिमंडल
- राहुल गांधी, कांग्रेस
- मल्लिकार्जुन खरगे, कांग्रेस
- ममता बनर्जी, टीएमसी
- उमर अब्दुल्ला, नेशनल कॉन्फ़्रेंस
- एमए बेबी, सीपीएम
- डी राजा, सीपीआई
- सुप्रिया सुले, एनसीपी एसपी
- थिरूमावलम, वीसीके
- मनोज झा, आरजेडी
- राजीव राय, समाजवादी पार्टी
राष्ट्रपति से मुलाकात में माना जा रहा है कि ये नेता राष्ट्रपति को मुख्य चुनाव आयुक्त की शिकायत करेंगे. मगर बीजेपी सूत्रों का कहना है कि इस मुद्दे पर इंडिया ब्लॉक में आम सहमति नहीं है. बीजेपी का कहना है कि जिस तरीके से इस मुद्दे पर कांग्रेस अगुवाई कर रही है, उससे सहयोगी दल खुश नहीं हैं. यही कारण है कि शरद पवार, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव जैसे नेता राष्ट्रपति से मुलाकात वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल नहीं हैं.
राष्ट्रपति के ज्ञापन में क्या मांगें होंगी ?
सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष के नेताओं की तीन प्रमुख मांगें होंगी. इसमें CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने, SIR प्रक्रिया रोकने और वोटर लिस्ट से बाहर किए गए 13 करोड़ वोटरों को फिर से जोड़ने की मांग होगी.
क्या हटाए जा सकते हैं ज्ञानेश कुमार?
इस मुलाकात में राष्ट्रपति की तरफ से विपक्षी दलों को कानूनी स्थिति से अवगत कराया जा सकता है. साथ ही कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की जा सकती है. कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान में निष्कासन शब्द का इस्तेमाल किया गया है. मगर, ये केवल दो आरोपों पर हटाए जा सकते हैं. एक सिद्ध दुर्व्यवहार और दूसरा अक्षमता.मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के आधारों को बताते हुए निष्कासन प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है. प्रस्ताव देने के लिए इस पर लोकसभा के 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया समझें
इसके बाद हस्ताक्षरित प्रस्ताव संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष या राज्यसभा में अध्यक्ष) को प्रस्तुत किया जाता है. अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. ये उनके विवेक पर निर्भर है. यदि आरोप स्वीकार कर लिए जाते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति (सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, एक प्रतिष्ठित न्यायविद) का गठन किया जाता है. ये समिति जांच करती है. मगर, मुख्य चुनाव आयोग को भी अपना बचाव करने का अधिकार है. यदि समिति इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं, तो प्रस्ताव वापस ले लिया जाता है और प्रक्रिया समाप्त हो जाती है.
आरोप सिद्ध होने के बाद भी मुश्किल है निकालना
यदि समिति मुख्य चुनाव आयुक्त को दुर्व्यवहार का दोषी या अक्षमता से ग्रस्त पाती है, तो रिपोर्ट उस सदन को प्रस्तुत की जाती है जहां मूल रूप से प्रस्ताव पेश किया गया था. फिर उस प्रस्ताव को पारित करने के लिए, उसी सत्र के दौरान संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत का समर्थन आवश्यक है. विशेष बहुमत का अर्थ है कि उस सदन की कुल सदस्यता का बहुमत, और उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत. जाहिर है जब तक जांच समिति मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी नहीं मान लेती और सरकार-विपक्ष एक मत होकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का निर्णय नहीं ले लेते या सरकार ही दो तिहाई बहुमत की हो तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं हटाया जा सकता.
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