पहलगाम की बैसरन वैली में हुए भयावह आतंकी हमले के दौरान 11 पर्यटकों की जान बचाने वाले टूरिस्ट गाइड नजाकत अली आज भी सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं. नजाकत अली ने एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि एक साल बीत जाने के बावजूद जम्मू‑कश्मीर सरकार की ओर से उन्हें कोई सहायता या सम्मान नहीं मिला, जबकि जिन पर्यटकों की उन्होंने जान बचाई, उन्होंने छत्तीसगढ़ बुलाकर उन्हें सम्मानित किया.
हमले के वक्त क्या हुआ
नजाकत अली पेशे से टूरिस्ट गाइड हैं और हमले के वक्त वह बैसरन वैली में पर्यटकों के साथ मौजूद थे. उसी दौरान आतंकियों ने घाटी में गोलीबारी शुरू कर दी. नजाकत उस समय जिप‑लाइन के एग्ज़िट पॉइंट के पास कुछ बच्चों के साथ रील बना रहे थे.
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नजाकत बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें समझ नहीं आया कि फायरिंग क्या है. उन्हें लगा कि शायद सेना और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हो रही है. लेकिन तभी एक आतंकी ने सीधे पर्यटकों को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

बैसरन में बना सेल्फी पॉइंट
सूझबूझ से बचाईं जिंदगियां
स्थिति भांपते ही नजाकत ने पर्यटकों से जमीन पर लेटने को कहा. जब आतंकी उनकी ओर बढ़ने लगा, तो नजाकत ने छत्तीसगढ़ से आए 11 पर्यटकों को तुरंत वहां से सुरक्षित निकालने का फैसला किया. वे सभी को लेकर करीब 7 किलोमीटर तक जंगल के रास्ते चलते हुए पहलगाम पहुंचे. इसी दौरान पता चला कि दो महिलाएं जंगल में छूट गई हैं. नजाकत बिना देर किए वापस जंगल गए और उन्हें भी सुरक्षित बाहर लेकर आए.
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निजी दुख भी झेला
नजाकत बताते हैं कि इसी बीच उन्हें यह दर्दनाक खबर मिली कि इस हमले में उनके मामा के बेटे सैयद आदिल शाह की मौत हो चुकी है. बावजूद इसके, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लोगों की जान बचाने को प्राथमिकता दी.
सम्मान मिला, पर सरकार खामोश
नजाकत अली कहते हैं कि जिन लोगों की उन्होंने जान बचाई, वे उन्हें छत्तीसगढ़ बुलाकर सम्मानित कर चुके हैं. इसके अलावा कुछ सामाजिक संगठनों ने भी उन्हें सम्मान दिया, लेकिन राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई मदद या आधिकारिक सम्मान नहीं मिला.
पर्यटन को लेकर मजबूत संदेश
नजाकत का कहना है, 'कश्मीर में टूरिस्ट आएं, उनके स्वागत के लिए एक नहीं, सैकड़ों नजाकत तैयार हैं.' उनका यह बयान न सिर्फ कश्मीरियों के जज़्बे को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आतंक के बावजूद यहां के लोग मेहमाननवाज़ी और इंसानियत में आज भी सबसे आगे हैं.
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