- जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को तीन आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला कर 26 लोगों की हत्या की थी
- NIA ने हमले की जांच करते हुए फॉरेंसिक और डिजिटल मैपिंग के साथ 1055 घंटे से अधिक पूछताछ की थी
- सेना ने ऑपरेशन महादेव चलाकर आतंकियों का पीछा किया और 28 जुलाई को तीनों आतंकियों को ढेर कर दिया था
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकियों ने जो कत्लेआम मचाया था, उसे एक साल हो गया है. तीन आतंकियों ने 22 अप्रैल को बैसरन घाटी में दोपहर करीब 1 बजे पर्यटकों पर हमला किया. घाटी में तीन आतंकियों ने मिलकर तीन तरफ से फायरिंग की. हमास स्टाइल में हमला किया गया था. वहां घूमने आए पर्यटकों को धर्म पूछकर गोली मारी गई. अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाए गए. लोगों को घुटनों के बल पर बैठाया और फिर प्वॉइंट ब्लैंक रेंज यानी बिल्कुल नजदीक से गोलियां मारी गईं. ये हत्याएं बड़ी बर्बरता की गईं. इस हमले में 26 लोग मारे गए थे. हमला करने के बाद तीनों आतंकी वहां से भागने में कामयाब रहे. इस हमले को लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेजिस्टेंट फोर्स (TRF) ने अंजाम दिया था.
पहलगाम हमले को एक साल पूरा हो गया है. इस हमले के बाद सेना ने 'ऑपरेशन महादेव' चलाकर आतंकियों को मारा. NIA ने जांच की. अब जब एक साल हो गया है, तो जानना जरूरी है कि पहलगाम अटैक के बाद एक साल में क्या-क्या हुआ?
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पहलगाम अटैक के बाद की जांच
पहलगाम अटैक के तुरंत बाद बैसरन घाटी को पूरी तरह बंद कर दिया गया. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शुरुआती जांच में तीन आतंकियों के पोस्टर जारी कर उन पर 20-20 लाख का इनाम रखा लेकिन इसी बीच इसकी जांच NIA को सौंप दी गई.
NIA ने बैसरन घाटी में घटनास्थल की फॉरेंसिक जांच और डिजिटल मैपिंग कराई. लोगों के खून से सने कपड़ों और स्पॉट पर खून से धब्बों की डीएनए जांच कराई गई. मौके पर पड़े बड़ी मात्रा में खाली कारतूसों को जब्त किया गया है. मोबाइल का डंप डेटा लिया गया.

इस हमले में मारे गए लोगों के परिजनों, खच्चर वालों, फोटोग्राफर, दुकानदार, होटल वाले, जिपलाइन वाले और स्थानीयों समेत 3 हजार से ज्यादा लोगों से 1,055 घंटे पूछताछ हुई. पहलगाम में लगे हर जगह के सीसीटीवी कैमरों के फुटेज को स्कैन किया गया. बैसरन घाटी से निकलने वाले करीब 58 रास्तों के एंट्री और एक्जिट प्वाइंट को चेक किया गया. इनसे पूछताछ के आधार पर संदिग्धों के स्केच तैयार किए गए.
NIA को बड़ी कामयाबी हमले के 2 महीने बाद 22 जून को तब मिली,जब बशीर अहमद और उसके भाई परवेज अहमद को गिरफ्तार किया गया. दोनों ने बताया कि तीनों आतंकी 21 अप्रैल 2025 की रात करीब 8 बजे बैसरन से करीब 2 किलोमीटर दूर परवेज की ढोंक में आए थे. आतंकियों के पास M -9 और 2 AK -47 राइफल थीं. 2 आतंकियों ने काली पोशाक पहनी थी. आतंकी खाना खाने के बाद कुछ खाना पैक कराकर भी ले गए थे. इन दोनों से तीनों आतंकियों के बारे में कई पुख्ता जानकारियां मिलीं.
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सेना का 'ऑपरेशन महादेव'
इधर NIA जांच कर रही थी और उधर सेना और पैरामिलिट्री फोर्स के साथ-साथ पुलिस ने आतंकियों को मिट्टी में मिलाने के लिए 22 अप्रैल को ही 'ऑपरेशन महादेव' शुरू किया. लगातार दक्षिणी कश्मीर के दुर्गम जंगलों में बड़ा सर्च ऑपरेशन जारी था. सुरक्षा बलों ने आतंकियों की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर जंगल छान मारा.
इसी बीच इनपुट मिला कि आतंकी दक्षिणी कश्मीर में हैं. ये आतंकी हापथनगर, बगमाड़ और त्राल से होते हुए श्रीनगर के पास दाचीगाम की जंगल की तरफ बढ़ रहे हैं. शुरुआत में यह ऑपरेशन 300 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा बड़े इलाके में फैला हुआ था, लेकिन लगातार निगरानी, पीछा करने और फौज की सटीक तैनाती की वजह से इस दायरे को धीरे-धीरे कम कर दिया गया.
इस पूरे मिशन में तकनीक का बहुत बड़ा हाथ रहा. घने जंगलों में आतंकियों की हलचल पर नजर रखने के लिए ड्रोन, रिमोट से चलने वाले विमान (RPA), इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और कई आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया गया. खुफिया जानकारी की लगातार जांच होती रही, जिससे आतंकियों पर दबाव बना रहा और उनके बचने के सारे रास्ते बंद होते गए.

10 जुलाई 2025 को नई जानकारी मिलने के बाद 'ऑपरेशन महादेव' अपने निर्णायक दौर में पहुंच गया. लिडवास, हरवान और दाचीगाम के इलाकों में बड़े पैमाने पर तालमेल के साथ अभियान शुरू किए गए. जवानों को जरूरत के हिसाब से तुरंत दूसरी जगहों पर तैनात किया गया और आतंकियों के भागने के रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया, जिससे वे एक छोटे से घेरे में फंसकर रह गए.
आतंकियों के सैटेलाइट फोन के सिग्नल ट्रैक करने के लिए 22 जुलाई तक कोशिश होती रही. 22 जुलाई को सेंसर के जरिए आतंकियों के होने की पुष्टि मिली. 93 दिनों की कड़ी मेहनत और 250 किलोमीटर तक पीछा करने के बाद, आखिरकार आतंकियों का घेरा सिर्फ 25 वर्ग किलोमीटर तक सिमट गया.
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और यूं ढेर हो गए तीनों आतंकी...
28 जुलाई 2025 को एक बेहद सटीक योजना के तहत सेना की 4 पैरा ने मोर्चा संभाला. इन जांबाजों ने बेहद खतरनाक रास्तों से होकर 10 घंटे में 3 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया ताकि आतंकियों को भनक न लगे. इसके बाद एक सटीक मुठभेड़ में तीनों आतंकियों को बैसरन घाटी से 109 किलोमीटर दूर ढेर कर दिया गया. मारे गए तीनों आतंकियों की पहचान सुलेमान उर्फ फैजल जट्ट, अफगान और जिब्रान के तौर पर हुई.
तीनों पाकिस्तानी आतंकी A श्रेणी के थे और लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर थे. ये आतंकी गगनगीर हमलों समेत कई आतंकी हमलों में शामिल थे. NIA ने 4 लोगों से आतंकियों के शवों की पहचान करवाई जिनमें उन्हें शरण देने वाले परवेज, बशीर और उनकी मां भी शामिल है. घटनास्थल से जो कारतूस मिले थे उनका FSL जांच पहले से करा ली गई थी.
आतंकियों के पास से मिले हथियार- एक M- 9 अमेरिकन राइफल और 2 AK -47 राइफल की बैलेस्टिक जांच चंडीगढ़ की फॉरेंसिक लैब में हुई. जांच के लिए तीनों हथियारों को एक विशेष विमान से तुरंत चंडीगढ़ भेजा गया. पूरी रात चंडीगढ़ में इन्हीं हथियारों से फायरिंग करके खाली खोखे जनरेट किए गए. दोनों खोखों का मिलान किया गया, जिससे पता चला कि पहलगाम हमले में इन्हीं हथियारों से फायरिंग हुई. तीनों आतंकियों की आईडी भी बरामद हुई. इनके पास से पाकिस्तान की बनी चॉकलेट भी मिली.
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NIA की चार्जशीट में क्या?
करीब 8 महीने की जांच के बाद NIA ने 15 दिसंबर 2025 को जम्मू-कश्मीर की स्पेशल कोर्ट में 1,597 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की, जिसमें 7 लोगों को आरोपी बनाया गया था. NIA ने आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और उसके संगठन TRF को भी आरोपी बनाया गया है.
चार्जशीट में पाकिस्तान में बैठे आतंकी हैंडलर साजिद जट्ट, ऑपरेशन महादेव में मारे गए फैजल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा, परवेज अहमद और बशीर अहमद के नाम हैं. NIA ने लश्कर और TRF और चारों आतंकियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आर्म्स ऐक्ट और UAPA की धाराओं के तहत आरोप लगाए हैं. NIA के मुताबिक, इस हमले की साजिश पूरी तरह से पाकिस्तान में रची गई थी.

हमले का मास्टरमाइंड साजिद जट्ट कौन है?
पाकिस्तानी आतंकी साजिद जट्ट उर्फ हबीबुल्लाह मलिक NIA की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल है और उस पर 10 लाख का इनाम है. लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके फ्रंट संगठन TRF का टॉप कमांडर साजिद जट्ट जम्मू-कश्मीर में हुए कई बड़े आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड रहा है. साजिद जट्ट पाकिस्तानी नागरिक है, पंजाब प्रांत के कसूर जिले का रहने वाला है.
साजिद जट्ट का असली नाम हबीबुल्लाह मलिक है. लेकिन वह कई और नामों से भी जाना जाता है. जैसे सैफुल्लाह, नूमी, नुमान, लंगड़ा, अली साजिद, उस्मान हबीब और शानी.
अक्टूबर 2022 में साजिद जट्ट को UAPA के तहत आतंकी घोषित किया गया था. साजिद पाकिस्तान के इस्लामाबाद स्थित लश्कर के हेडक्वार्टर से अपने ऑपरेशन चलाता है. साजिद TRF का ऑपरेशनल चीफ तो है ही साथ ही घाटी में भर्ती, फंडिंग और घुसपैठ का जिम्मा भी उसका है.
साजिद जट्ट का नाम इन हमलों में सामने आया
- धांगरी नरसंहार (जनवरी 2023, राजौरी) – 7 नागरिकों की हत्या
- IAF काफिले पर हमला (मई 2024, पुंछ) – एक जवान शहीद
- रियासी बस हमला (जून 2024) – तीर्थयात्रियों से भरी बस पर हमला
- पहलगाम आतंकी हमला (अप्रैल 2025) – पर्यटकों पर हमला, 26 की मौत
हाइब्रिड आतंकियों को लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल सपोर्ट देने का आरोप भी साजिद जट्ट पर है. वह कश्मीर में आतंकी नेटवर्क का सबसे खतरनाक चेहरा माना जाता है.
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