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लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोले ओम बिरला, सुनाया अटल बिहारी वाजपेयी का 1957 का किस्सा

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि सदन नियमों से चलता है और कोई सदस्य उनसे ऊपर नहीं. उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1957 में स्पीकर की अनुमति लेकर दस्तावेज दिखाने का उदाहरण देते हुए संसदीय मर्यादा के महत्व को रेखांकित किया.

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोले ओम बिरला, सुनाया अटल बिहारी वाजपेयी का 1957 का किस्सा
  • ओम बिरला ने सदन को 140 करोड़ भारतीयों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधि बताया.
  • उन्होंने सदन में निष्पक्षता, अनुशासन और नियमों के पालन को महत्त्वपूर्ण बताया.
  • बिरला ने कहा- मैंने विपक्ष द्वारा आसन की निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों को गंभीरता से सुना.
नई दिल्ली:

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद स्पीकर ओम बिरला ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि यह सदन 140 करोड़ भारतीयों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और उनकी कोशिश रही है कि हर सदस्य को नियमों के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिले. उन्होंने बताया कि वे उन सदस्यों को भी प्रोत्साहित करते रहे हैं जो संकोच के कारण सदन में कम बोलते हैं.

स्पीकर ने कहा कि सदन हमेशा विचारों का जीवंत मंच रहा है, जहां सहमति और असहमति दोनों की परंपरा को सम्मान मिला है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सदन की कार्यवाही हमेशा निष्पक्षता, अनुशासन और नियमों के आधार पर चलती है, और सभी के लिए नियम समान हैं.

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अविश्वास प्रस्ताव पर दो दिनों की चर्चा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि विपक्ष ने आसन की निष्पक्षता और कार्यकुशलता पर सवाल उठाए, लेकिन उन्होंने हर दृष्टिकोण को गंभीरता से सुना और सम्मान दिया. उन्होंने कहा, 'यह आसन किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और संविधान की भावना का प्रतीक है.'

अटल बिहारी वाजपेयी का किस्सा सुनाकर समझाई ‘मर्यादा' की परिभाषा

ओम बिरला ने सदन में नियमों के सम्मान को रेखांकित करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी का एक ऐतिहासिक प्रसंग सुनाया. 1957 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान, जब वाजपेयी जी ने जम्मू‑कश्मीर से जुड़े कुछ फोटो दिखाने चाहे, तो उस समय के स्पीकर ने उन्हें रोका और कहा कि पहले तस्वीरें अध्यक्ष को दिखानी होंगी. वाजपेयी ने इस पर सदन की मर्यादा का पालन करते हुए सभी दस्तावेज स्पीकर को दिखाए और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई.

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इसके साथ ही ओम बिरला ने 1958 की एक और घटना याद दिलाई, जब सांसद रेनू चक्रवर्ती किसी गैर‑सरकारी कागज को सदन के पटल पर रखना चाहती थीं, लेकिन स्पीकर ने मंजूरी न मिलने पर उन्हें रोक दिया. यह दर्शाता है कि सदन में कोई भी सदस्य नियमों से ऊपर नहीं है.

स्पीकर ने स्पष्ट किया- प्रतिपक्ष भी नियमों के भीतर बोल सकता है

कुछ सदस्यों द्वारा प्रतिपक्ष के नेताओं को रोके जाने के आरोपों पर बिरला ने कहा कि कोई भी विषय हो- प्रधानमंत्री, मंत्री या प्रतिपक्ष के नेता, हर किसी को नियम 370 के तहत अनुमति लेकर ही बोलना होता है. नियम सदस्यों के प्रतिबंध का नहीं, बल्कि सदन की गरिमा बनाए रखने का माध्यम हैं.

सदन का विश्वास मेरी जिम्मेदारी है

इसके अलावा स्पीकर ने कहा कि सदन ने उन पर जो विश्वास व्यक्त किया है, वे उसे अपनी जिम्मेदारी मानकर पूरी निष्ठा से निभाने का प्रयास करेंगे.

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