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महानदी किनारे प्यासा गांव! नाले में गड्ढा खोदकर पानी पी रहे ग्रामीण, बूंद-बूंद के लिए मोहताज 120 परिवार 

ओडिशा के अंगुल जिले में महानदी किनारे बसे करड़ापड़ा गांव में भीषण जल संकट बना हुआ है. 120 परिवारों के 600 से अधिक लोग नाले में गड्ढा खोदकर पानी पीने को मजबूर हैं. हैंडपंप खराब और कुएं सूख चुके हैं, जबकि पेयजल योजना भी विफल हो गई है.

महानदी किनारे प्यासा गांव! नाले में गड्ढा खोदकर पानी पी रहे ग्रामीण, बूंद-बूंद के लिए मोहताज 120 परिवार 

महानदी जैसे विशाल जल स्रोत के किनारे बसे गांव में अगर लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएं, तो यह किसी विडंबना से कम नहीं. ओडिशा के अंगुल जिले में सतकोशिया टाइगर रिजर्व के भीतर बसे करड़ापड़ा गांव की हालत कुछ ऐसी ही बन गई है. यहां 120 परिवारों के करीब 600 से ज्यादा लोग रोज पीने के पानी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों को जंगल के नाले में गड्ढा खोदकर पानी इकट्ठा करना पड़ रहा है.

महानदी किनारे फिर भी प्यासे ग्रामीण

करड़ापड़ा गांव चारों ओर से प्राकृतिक संसाधनों से घिरा हुआ है. एक तरफ बहती महानदी और दूसरी ओर हरे-भरे जंगल, लेकिन इसके बावजूद गांव में पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है. यहां रहने वाले लोग खेती, जंगल उत्पाद और मजदूरी पर निर्भर हैं, लेकिन इन दिनों उनकी सबसे बड़ी चिंता पानी की हो गई है.

हैंडपंप खराब, कुएं सूखे

गांव में मौजूद 10 से ज्यादा हैंडपंप खराब पड़े हैं. दो खुले कुएं भी पूरी तरह सूख चुके हैं. ऐसे में ग्रामीणों के पास पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं बचा है. गर्मी बढ़ने के साथ स्थिति और भी खराब हो गई है, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है.

करीब पांच साल पहले गांव में पाइपलाइन आधारित पेयजल योजना शुरू की गई थी. इसके तहत बोरवेल, ओवरहेड टैंक और पाइपलाइन का निर्माण हुआ, लेकिन हर साल गर्मी आते ही बोरवेल सूख जाता है और पानी की सप्लाई बंद हो जाती है. इससे लोगों को राहत मिलने की बजाय परेशानी और बढ़ गई है.

नाले में ‘चुआं' बनाकर पी रहे पानी

स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि ग्रामीणों को गांव से दूर जंगल के नाले में जाना पड़ता है. वहां वे ‘चुआं' यानी छोटा गड्ढा खोदकर उसमें जमा पानी पीने और घर लाने के लिए मजबूर हैं. बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी तपती धूप में घंटों मेहनत करते हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस समस्या की शिकायत प्रशासन से कई बार की है. इसके बाद टैंकर से पानी भेजा जाता है, लेकिन यह केवल चार से पांच दिन में एक बार ही मिलता है. इतने बड़े गांव के लिए यह मात्रा बेहद कम है, जिससे समस्या जस की तस बनी हुई है.

पशु भी प्यास से बेहाल

पानी की कमी का असर सिर्फ लोगों पर ही नहीं, बल्कि उनके पशुओं पर भी पड़ रहा है. मवेशियों के लिए पानी जुटाना भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है. इससे उनकी आजीविका पर भी असर पड़ने लगा है. पिछले करीब दो महीनों से गांव के लोग इस जल संकट से जूझ रहे हैं. अगर जल्द कोई स्थायी समाधान नहीं निकला, तो आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं.  

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