Jharkhand News: झारखंड के चतरा जिले में भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच जल संकट ने विकराल रूप ले लिया है. आसमान से बरसती आग के बीच यहां की आदिम जनजातियां बैगा, बिरहोर और गंझू बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही हैं.
सरकारी फाइलों में 'हर घर नल-जल' योजना भले ही सफल दिख रही हो लेकिन धरातल पर प्रतापपुर प्रखंड के हेसातू गांव की तस्वीरें व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी हैं. यहां के ग्रामीण आज भी आदिम युग की तरह नदी की रेत में 'चूआ' (गड्ढा) खोदकर मटमैला पानी पीने को मजबूर हैं.
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बच्चों की सेहत पर भारी पड़ रहा गंदा पानी
प्रतापपुर के परहिया टोला में स्थिति भयावह है. जलस्तर गिरने से गांव के कुएं और चापाकल पूरी तरह सूख चुके हैं. ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि वे कई बार गुहार लगा चुकी हैं लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. मजबूरी में ग्रामीण नदी की गंदी जलधारा का उपयोग कर रहे हैं जिससे मासूम बच्चे लगातार संक्रमण और बीमारियों का शिकार हो रहे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि इलाज में उनकी जमा-पूंजी खत्म हो रही है और प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त है.

कैमरा देख जागी प्रशासन की नींद
जब मीडिया की टीम ने इस बदहाली को कैमरे में कैद किया और चतरा उपायुक्त (डीसी) रवि आनंद से सीधे सवाल पूछे तब जाकर सिस्टम हरकत में आया. डीसी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रतापपुर बीडीओ को तत्काल युद्ध स्तर पर चापाकल और जलमीनार दुरुस्त करने के सख्त निर्देश दिए हैं. उन्होंने आश्वासन दिया है कि आदिम जनजातियों को पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा.
आखिर कहां जाता है करोड़ों का बजट?
बड़ा सवाल यह है कि आदिम जनजातियों के उत्थान के लिए आने वाला करोड़ों का बजट आखिर जाता कहां है? क्या सरकारी योजनाएं केवल सड़कों के किनारे वाले गांवों तक ही सीमित हैं? चतरा की ये तस्वीरें बताती हैं कि सुदूर इलाकों में आज भी लोग प्यास से लड़ रहे हैं. अब देखना यह है कि डीसी के आदेश के बाद ग्रामीणों को साफ पानी मिलता है या वे फिर से आश्वासन का ही 'गंदा पानी' पीने को मजबूर होंगे.
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