- नीति आयोग ने 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में शहरी शासन सुधार के लिए एक नया फ्रेमवर्क तैयार किया है
- मेयर के चुनाव को प्रत्यक्ष कराने की सिफारिश की गई है ताकि जनता सीधे मेयर चुन सके
- मेयर के पद का कार्यकाल निश्चित समय के लिए रखने की भी सिफारिश रिपोर्ट में शामिल है
शहरों के मेयर को अब तक पार्षद चुनते आ रहे हैं, लेकिन अगर नीति आयोग की इस सिफारिश को मान लिया गया तो मेयर को भी सीधे जनता ही चुन सकेगी. दरअसल, शहरी इलाकों में शासन व्यवस्था में सुधार के लिए नीति आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की है. इसें 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में मूलभूत व्यवस्था में सुधार के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया गया है. मेयर पद के चुनाव में होने वाली धांधली की खबरों के बीच इस रिपोर्ट में कुछ उपाय सुझाए गए हैं.
मेयर के चुनाव को लेकर नीति आयोग ने यह सिफारिश ऐसे समय की है, जब मेयर पद के चुनाव को लेकर कई धांधली सामने आई हैं. जनवरी 2024 में चंडीगढ़ में मेयर पद के चुनाव में धांधली सामने आई थी, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ था और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया था.
मेयर के लिए हो प्रत्यक्ष चुनाव
नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सबसे बड़ी सिफारिश नगर निगम के मेयर के चुनाव को लेकर की है. रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि मेयर पद का चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर हो, न कि अप्रत्यक्ष तौर पर. इसका मतलब मेयर पद के चुनाव के लिए लोग सीधे वोटिंग करें.
मौजूदा व्यवस्था में नगर निगम या निकायों के वार्ड पार्षदों का सीधा चुनाव होता है और फिर चुने हुए वार्ड पार्षद मेयर का चुनाव करते हैं.
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कार्यकाल तय समय के लिए हो
रिपोर्ट में आयोग ने ये भी सिफारिश की है कि मेयर के पद का कार्यकाल एक निश्चित समय के लिए होना चाहिए ताकि निर्णय लेने में निरंतरता, स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके. रिपोर्ट में एक मेयर परिषद बनाने की वकालत की गई है जो निर्णय लेने में मेयर की मदद भी करे और निगरानी भी.
जरूरी सेवाओं को एकीकृत किया जाए
एक और अहम सिफारिश में कहा गया है कि पेयजल, स्वच्छता और सार्वजनिक परिवहन जैसी सेवाओं को सीधे शहरी निकाय या निगम प्रशासन के तहत लाया जाना चाहिए. इस कदम से काम के समन्वय और जवाबदेही को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी. इसके अलावा शहरी निकायों की वित्तीय हालत को सुधारने के लिए उन्हें खुद की कमाई के साधन जुटाने सिफारिश भी की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी राज्यों को अपने निकाय कानूनों में संशोधन करना चाहिए.
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