राष्ट्रीय महिला आयोग ने जेलों में बंद महिला कैदियों की दशा सुधारने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है. आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर की अगुवाई में तैयार की गई इस रिपोर्ट का नाम 'जेल में महिलाओं से जुड़े कानून' है.
महिला आयोग ने इस रिपोर्ट को देश के गृह मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भेज दिया है, ताकि इन सिफारिशों को जल्द से जल्द लागू किया जा सके. इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए महिला आयोग ने देश के विभिन्न शहरों जैसे देहरादून, नोएडा, पटियाला, हैदराबाद, पटना, भोपाल और गोवा आदि में जेल अधिकारियों, जजों, वकीलों, पुलिस और सामाजिक संस्थाओं के साथ लंबी बैठकें कीं. इसके बाद अंडमान-निकोबार के विजया पुरम में एक बड़ी राष्ट्रीय बैठक का आयोजन किया गया. इन सभी प्रयासों के बाद कुल 200 से अधिक सुझाव प्राप्त हुए, जिनमें से 145 मुख्य सुझावों को इस फाइनल रिपोर्ट में शामिल किया गया है.
राष्ट्रीय जेल आयोग बनाने की सिफारिश
महिला आयोग ने सरकार से देश में एक स्वतंत्र और विशेष सरकारी संस्था बनाने की मांग की है, जिसका नाम 'नेशनल कमीशन फॉर प्रिजन्स' (राष्ट्रीय जेल आयोग) हो. यह संस्था देश की सभी जेलों के कामकाज पर नजर रखेगी, कैदियों के अधिकारों की रक्षा करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि जेलों में, विशेषकर महिला कैदियों के साथ, गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाए.
महिला आयोग की रिपोर्ट की मुख्य बातें और बड़े सुझाव
राष्ट्रीय महिला आयोग ने जेल से जुड़े कई पुराने और नए कानूनों (जैसे- मॉडल प्रिजन्स एक्ट 2023, भारतीय न्याय संहिता 2023 आदि) में व्यापक बदलाव करने की मांग की है. रिपोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. डॉक्टर, इलाज और मानसिक स्वास्थ्य
- स्थायी स्टाफ की तैनाती: जेलों में स्थायी रूप से महिला डॉक्टर, गाइनोकोलॉजिस्ट (महिला रोग विशेषज्ञ), नर्स और महिला मानसिक रोग विशेषज्ञ (साइकियाट्रिस्ट) तैनात की जाएं.
- डिजिटल हेल्थ सिस्टम: कैदियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए टेलीमेडिसिन, डिजिटल हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम और जेल स्वास्थ्य रिकॉर्ड को जिला स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा जाए. इसके तहत कैदियों की सेहत से जुड़ी जानकारी डिजिटल रूप से सुरक्षित रहेगी और जरूरत पड़ने पर डॉक्टरों से ऑनलाइन परामर्श भी लिया जा सकेगा.
- अनिवार्य स्वास्थ्य जांच: महिला कैदियों के लिए ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी और एनीमिया (खून की कमी) जैसी गंभीर जांचें अनिवार्य की जाएं.
- काउंसलिंग की व्यवस्था: जो महिला कैदी किसी गहरे मानसिक सदमे से गुजरी हैं, उनके लिए जेल के अंदर और जेल से रिहा होने के बाद भी काउंसलिंग का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.
2. गर्भवती महिला कैदी और उनके बच्चों के अधिकार
- जेल से बाहर डिलीवरी: गर्भवती महिला कैदियों की डिलीवरी जेल के अंदर न कराकर, बाहर के बड़े सरकारी अस्पतालों में ही कराई जाए.
- जन्म प्रमाण पत्र पर गोपनीयता: जेल में पैदा होने वाले बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र पर 'जेल का पता' या 'जेल में जन्म' अंकित नहीं होना चाहिए, ताकि भविष्य में बच्चे को किसी भी तरह की सामाजिक शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े.
- मां के साथ रहने की उम्र सीमा में बढ़ोतरी: वर्तमान में बच्चे अपनी मां के साथ केवल 6 साल की उम्र तक ही जेल में रह सकते हैं. आयोग ने इसे बढ़ाकर 10 साल करने की सिफारिश की है, ताकि बच्चा अपनी मां के साथ ज्यादा वक्त बिता सके. साथ ही, उसकी पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च जेल प्रशासन द्वारा उठाया जाए.
- मातृत्व लाभ और पोषण: जेल में बंद अंडरट्रायल और सजा काट रही महिला कैदियों को मातृत्व से जुड़ी सभी जरूरी सुविधाएं और लाभ दिए जाएं. मां के साथ रह रहे बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं.
- सुरक्षात्मक व्यवस्था: यदि माता-पिता दोनों जेल में हैं, तो बच्चों की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए पूरी व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा ताकि ऐसे बच्चों को लावारिस न छोड़ा जाए और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा व पोषण मिलता रहे.
3. प्रशिक्षण, काउंसलिंग और पुनर्वास कार्यक्रम
- बाल-अनुकूल मुलाकात केंद्र: जेलों में बच्चों के अनुकूल मुलाकात केंद्र बनाए जाएं, जहां वे बिना किसी भय के अपने परिजनों से मिल सकें. इसके अलावा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, फोन और अन्य डिजिटल माध्यमों से भी मुलाकात की सुविधाओं का विस्तार किया जाए.
- कौशल विकास: कैदियों के लिए पुनर्वास, कौशल विकास, व्यावसायिक प्रशिक्षण और नियमित परामर्श कार्यक्रम चलाए जाएं.
- रिहाई के बाद सहायता: जेल से रिहा होने के बाद समाज में दोबारा स्थापित होने के लिए विशेष सहायता कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएं. इसके लिए जिला स्तर पर 'रिहा कैदी सहायता समितियों' का गठन किया जाए.
4. ट्रांसजेंडर कैदियों के लिए विशेष नियम
- निजता का सम्मान: ट्रांसजेंडर कैदियों की तलाशी केवल महिला पुलिस अधिकारी ही लें, ताकि उनकी निजता और सम्मान को कोई ठेस न पहुंचे.
- सुरक्षित बैरक: जेलों में उनके रहने के लिए अलग और सुरक्षित बैरक बनाए जाएं ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के भेदभाव, शोषण या प्रताड़ना से सुरक्षित रखा जा सके.
5. कोर्ट-कचहरी और जमानत के नियम
- निजी मुचलके पर रिहाई: यदि किसी महिला ने ऐसा अपराध किया है जिसमें जमानत मिल सकती है और वह आर्थिक रूप से कमजोर (गरीब) है, तो उसे बिना पैसों के सिर्फ पर्सनल बॉन्ड (निजी मुचलके) पर रिहा किया जाए.
- जमानत में प्राथमिकता: जिन मामलों में फांसी या उम्रकैद की सजा का प्रावधान नहीं है, उनमें महिलाओं को जमानत देने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
- विशेष छूट: गर्भवती और स्तनपान कराने वाली (दूध पिलाने वाली) महिलाओं को जमानत के नियमों में विशेष छूट दी जानी चाहिए.
6. जेल प्रशासन में 50% महिला स्टाफ की अनिवार्यता
- महिलाओं की भागीदारी: आयोग का सुझाव है कि जेलों में तैनात कुल स्टाफ में से कम से कम 50% संख्या महिलाओं की होनी चाहिए.
- उच्च पदों पर नियुक्ति: महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों को प्रभावी ढंग से संभालने के लिए ऊंचे पदों पर महिला आईजी और डीआईजी की नियुक्ति की जाए.
- संवाद के मंच: महिला कैदियों की समस्याओं को सीधे बड़े अफसरों तक पहुंचाने के लिए जेलों में 'नारी बंदी सभा' का गठन किया जाए और हर तीन महीने में 'महापंचायत' का आयोजन किया जाना चाहिए.
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