सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक आरोपी को 9 साल से अधिक समय तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहने और ट्रायल में लगातार हो रही देरी को देखते हुए जमानत दे दी. SC ने कहा कि किसी आरोपी के जेल में रहने की स्थिति में ट्रायल का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करना अदालत और अभियोजन, दोनों की जिम्मेदारी है. मामले में हो रही अत्यधिक देरी ने हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है.
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए लियाकत अली को जमानत प्रदान की. दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 382, 201 और धारा 34 के तहत दर्ज मामले में नौ वर्ष दो माह से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में था. अदालत ने कहा कि वर्ष 2024 में आरोपी की पिछली जमानत याचिका पर अंतिम निर्णय हो जाने के बाद भी मुकदमे की सुनवाई में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई. अब तक अभियोजन पक्ष के 30 में से केवल 12 गवाहों की ही गवाही दर्ज की जा सकी है.
पीठ ने कहा, जब कोई आरोपी हिरासत में हो, तब ट्रायल का शीघ्र संचालन सुनिश्चित करना अदालत और अभियोजन एजेंसी, दोनों का दायित्व है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी कथित अपराध के समय किशोरावस्था में था और नौ वर्ष से अधिक समय से “बिना उसकी किसी गलती” के जेल में है. अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और वर्तमान गति को देखते हुए ट्रायल के पूरा होने में अभी काफी समय लग सकता है.
पीठ ने टिप्पणी की कि ट्रायल में लगातार हो रही देरी और लंबे समय तक कारावास ने हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि आरोपी नई जमानत याचिका सक्षम अदालत में दाखिल कर सकता था और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट आने की आवश्यकता नहीं थी. हालांकि, अदालत ने कहा कि इस मामले के असाधारण तथ्य संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग करते हैं
अदालत ने आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए दोहराया कि निर्दोषता की धारणा और “जमानत नियम है, जेल अपवाद” के सिद्धांत को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए लियाकत अली को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया.
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