'सरकारी नौकरी करना गुलामी को बढ़ावा देना है.' गांधीजी के मुंह से ये सुनना था कि प्रेमचंद ने तय कर लिया, वे इस्तीफा दे देंगे. 20 साल की नौकरी थी, घर में पत्नी, दो बच्चे थे, बीमारी ने भी घेर रखा था. लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी को एक देशप्रेमी ने लात मार दी.
पत्नी शिवरानी देवी ने किताब 'प्रेमचंद घर में' उस वाकये के बारे में लिखा है- वे मुझसे बोले, तुम राय देती तो नौकरी छोड़ देता. मैंने जवाब दिया- सोचने के लिए दो-तीन दिन का समय दीजिए. फिर वे खुद ही बोले- मैं चाहता हूं, तुम विचार ठीक कर लो.' प्रेमचंद मन बना चुके थे. बस पत्नी की सहमति चाहते थे.
एक तरफ अंग्रेजी हुकूमत की सुरक्षित नौकरी थी. हर महीने अच्छी तनख्वाह थी. दूसरी तरफ था- देशप्रेम, आजादी का सपना और गांधीजी का आह्वान. प्रेमचंद ने आराम की जिंदगी छोड़ देशप्रेम का रास्ता चुना. नौकरी छोड़ी तो जिंदगी ने उन्हें कुछ समय के लिए कारोबारी भी बना दिया.
हिंदी-उर्दू के महान लेखक-उपन्यासकार के तौर पर तो आप मुंशी प्रेमचंद को जानते ही हैं, उनकी पुण्यतिथि पर आइए परिचय करा देते हैं, कारोबारी प्रेमचंद से.
दिल्ली यूनिवर्सिटी में साहित्य के शिक्षक डॉ प्रकाश उप्रेती कहते हैं, 'सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद ने कारोबारी बनने की कोशिश की थी. गोरखपुर में दुकान ली, चरखे लगाए, करघे चलाए और कपड़े का कारोबार शुरू किया. उम्मीद थी कि इससे घर भी चलेगा और स्वदेशी का सपना भी आगे बढ़ेगा. लेकिन कारोबार उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं चला. इससे पहले सरकारी नौकरी अच्छी चल रही थी.
20 रुपये की नौकरी से शुरू हुआ सफर
मैट्रिक पास करने के बाद साल 1900 में प्रेमचंद पहली बार प्रतापगढ़ के जिला स्कूल में सरकारी शिक्षक बने. उस वक्त उनकी तनख्वाह सिर्फ 20 रुपये महीने थी.
इसके बाद बहराइच, इलाहाबाद और बस्ती में उनकी पोस्टिंग हुई. साल 1919 में बीए करने के बाद उनका प्रमोशन हुआ और वो शिक्षा विभाग में सब डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स बन गए.
यानी 20 रुपये महीने से शुरू हुई नौकरी अब एक सुरक्षित सरकारी करियर में बदल रही थी. आगे प्रमोशन और बेहतर पद की पूरी संभावना थी.
लेकिन फिर आया साल 1921.
गांधीजी की बात सुनी और 20 साल पुरानी नौकरी छोड़ दी
8 फरवरी 1921 को गोरखपुर के बाले मियां मैदान में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन के तहत भाषण दिया.
गांधी ने सरकारी नौकरियों, स्कूल-कॉलेज और अंग्रेजी शासन की संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की. स्वदेशी अपनाने और देश के लिए व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग करने का संदेश दिया.
प्रेमचंद के भीतर भी अंग्रेजी शासन को लेकर असंतोष था. गांधी के भाषण ने उनके फैसले को दिशा दे दी.
फैसला आसान नहीं था. घर में दो बच्चे थे. पत्नी शिवरानी देवी गर्भवती थीं. खुद प्रेमचंद भी गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे.
इसके बावजूद उन्होंने करीब 20 साल पुरानी सरकारी नौकरी छोड़ दी.
अब हर महीने आने वाली सरकारी तनख्वाह बंद हो चुकी थी. परिवार की जिम्मेदारी सामने थी और आगे की जिंदगी का रास्ता साफ नहीं था.
यहीं से प्रेमचंद की जिंदगी में एक नया चैप्टर शुरू हुआ-कारोबार का.
गोरखपुर में शुरू किया कपड़े का कारोबार
नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद गोरखपुर में ही रहना चाहते थे. वो सिर्फ साहित्य लिखकर घर चलाने की स्थिति में नहीं थे. उन्होंने महावीर प्रसाद पोद्दार की मदद से हिंदी और उर्दू अखबार निकालने की योजना भी बनाई.
सरकारी मकान छोड़ने के बाद वो परिवार के साथ पोद्दार जी के मानीराम स्थित आवास पर चले गए. शिवरानी देवी ने अपनी किताब ‘प्रेमचंद घर में' में इस दौर का जिक्र किया है.
इसी दौरान एक और विचार सामने आया- क्यों न ऐसा कारोबार किया जाए जिससे परिवार का खर्च भी चल सके और स्वदेशी के विचार को भी आगे बढ़ाया जा सके?
तय हुआ कि महावीर प्रसाद पोद्दार के साथ मिलकर करघे का कारोबार शुरू किया जाए.
गोलघर में दुकान ली, 10 चरखे लगाए
योजना को जमीन पर उतारा गया. गोरखपुर के गोलघर में एक दुकान ली गई. वहां 10 चरखे लगाए गए. करघे चलने लगे और कपड़ा बनाने का काम शुरू हो गया.
जरा इस तस्वीर की कल्पना कीजिए- कुछ समय पहले तक सरकारी दफ्तर में बैठकर स्कूलों का निरीक्षण करने वाला अधिकारी अब अपनी दुकान में चरखे और करघे चलाने के कारोबार को खड़ा करने में जुटा था.
ये सिर्फ कमाई का प्रयोग नहीं था. उस समय चरखा और देशी कपड़ा स्वदेशी आंदोलन के बड़े प्रतीक थे. यानी प्रेमचंद के लिए कारोबार में आर्थिक जरूरत और देशभक्ति, दोनों बातें जुड़ी हुई थीं.
प्रेमचंद इस काम को लेकर गंभीर थे. उन्होंने एक पत्र में भी लिखा कि उन्होंने फिलहाल कपड़े का कारखाना खोल रखा है, जहां करघे चल रहे हैं. कुछ चरखे आदि भी बनवाए जा रहे हैं.
उन्हें उम्मीद थी कि इस काम से हर महीने कुछ न कुछ मुनाफा जरूर होगा. लेकिन यहीं कारोबार और साहित्य की दुनिया का फर्क सामने आया.
कारोबार शुरू हुआ, लेकिन मुनाफा उम्मीद जितना नहीं
दुकान थी. चरखे थे. करघे चल रहे थे. कपड़ा बन रहा था. लेकिन कारोबार चलाने के लिए सिर्फ उत्पादन काफी नहीं होता.
सवाल था- मुनाफा कितना होगा?
प्रेमचंद ने खुद भी माना था कि कारोबार से इतना मुनाफा नहीं हो रहा था कि वो पूरी तरह इसी आमदनी पर निर्भर रह सकें.
यानी जिस काम से उन्होंने घर चलाने की उम्मीद की थी, वही काम आर्थिक सुरक्षा नहीं दे पा रहा था.
एक तरफ परिवार की जिम्मेदारी थी और दूसरी तरफ कारोबार की सीमाएं. आखिरकार ये कारोबारी प्रयोग ज्यादा लंबा नहीं चल सका.
प्रेमचंद को गोरखपुर छोड़कर अपने पैतृक गांव लमही लौटना पड़ा.
प्रेमचंद का कपड़े का कारोबार भले ही सफल नहीं हुआ, लेकिन उनकी जिंदगी का ये छोटा-सा अध्याय बहुत कुछ बताता है.
सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने सिर्फ लेखक बनने का फैसला नहीं किया था. उन्होंने परिवार की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए कारोबार का जोखिम भी उठाया.
आज जब किसी कारोबार की सफलता को सिर्फ मुनाफे से मापा जाता है, प्रेमचंद की कहानी का ये हिस्सा थोड़ा अलग नजर आता है.
नौकरी नहीं छोड़ते तो बन सकते थे बड़े अफसर
प्रेमचंद के नौकरी छोड़ने के फैसले की कीमत सिर्फ आर्थिक नहीं थी. उन्होंने ऐसा करियर छोड़ा था, जिसमें आगे बढ़ने की पूरी संभावना थी.
फिराक गोरखपुरी ने अपने एक लेख में लिखा था कि अगर प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी नहीं छोड़ी होती, तो वो सूबे के शिक्षा विभाग के बड़े अफसरों में गिने जाते.
उनका मूल नाम धनपत राय था. आगे चलकर दुनिया उन्हें मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानने लगी. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा.
साल 1936 में आज ही की तारीख में (8 अक्टूबर 1936 को) उनका निधन हुआ. इतने लंबे समय तक कि करीब एक सदी बाद भी प्रेमचंद सिर्फ हिंदी साहित्य का नाम नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, जोखिम और अपने रास्ते खुद चुनने की कहानी भी हैं.
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