फिल्म प्रोड्यूसर राम गोपाल वर्मा ने बिल्कुल सही पोस्ट किया है कि अंडरवर्ल्ड के इकोसिस्टम में शूटर्स सबसे आसानी से बदले जा सकने वाले, सबसे ज्यादा 'डिस्पोजेबल' और सबसे सस्ते मोहरे होते हैं.
उनका यह बयान उन पुलिसकर्मियों की तारीफ के संदर्भ में आया है, जिन्होंने दो हफ्ते पहले बॉलीवुड एक्टर टाइगर श्रॉफ पर गोली चलाने वाले आरोपियों को गिरफ्तार किया था.
राम गोपाल वर्मा, जिन्होंने मुंबई अंडरवर्ल्ड पर कई फिल्में बनाई हैं - जिनमें उनकी मशहूर फिल्म 'सत्या' (1998) भी शामिल है - इस विषय के एक तरह से विशेषज्ञ बन गए हैं. मुंबई के संगठित अपराध सिंडिकेट्स पर उनकी टिप्पणियां उन रिसर्च पर आधारित हैं जो उन्होंने अपनी फिल्मों के लिए किए थे.
80 और 90 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड गिरोहों की रीढ़ उनके शूटर्स या हिटमैन हुआ करते थे, जो अपने खौफ के दम पर शहर पर राज करते थे.
जब कोई माफिया डॉन किसी कारोबारी, होटल मालिक, बिल्डर या फिल्म प्रोड्यूसर को फिरौती के लिए फोन करता था, तो उसे गंभीरता से तभी लिया जाता था, जब सामने वाले को पता होता था कि उस डॉन के पास शूटर्स की एक पूरी फौज है. ये शूटर्स विदेशों में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर अपने टारगेट पर गोलियां बरसा देते थे. इसके बाद पैदा होने वाला खौफ गिरोहों के लिए लोगों से जबरन वसूली करना आसान बना देता था.
टाइगर श्रॉफ के मामले में, लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने कुछ युवाओं को चंद हजार रुपयों का लालच देकर और उन्हें विदेश में बसाने का सपना दिखाकर काम पर रखा था.
आइए समझते हैं कि 80 और 90 के दशक में सक्रिय विभिन्न गिरोह किस तरह नौजवान लड़कों को अपने शूटर्स के रूप में भर्ती करते थे.
दाऊद इब्राहिम यानी 'डी-कंपनी'
1994 में दाऊद और छोटा राजन के अलग होने के बाद, बाबू शकील अहमद उर्फ छोटा शकील इस गिरोह में दूसरे नंबर का सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गया.
उसने अपने टारगेट को खत्म करने के लिए मुख्य रूप से भिंडी बाजार, डोंगरी, मझगांव, नागपाड़ा, अग्रीपाड़ा और माहिम जैसे निम्न-मध्यम वर्गीय इलाकों से मुस्लिम युवाओं को काम पर रखा.

शकील के साथ जुड़ने वाले इन युवाओं के लिए पैसा और एक 'स्टाइलिश लाइफस्टाइल' सबसे बड़े आकर्षण थे. युवाओं को गैंग में शामिल करने के लिए धर्म का भी इस्तेमाल किया जाता था, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी छोटा राजन के शूटर उन मुसलमानों को मार रहे थे, जिन पर 1993 के सीरियल ब्लास्ट में शामिल होने का आरोप था.
फिरोज कोंकणी, मुन्ना झिंगाडा और फीलू खान, डी-कंपनी के सबसे खतरनाक शूटरों में से थे.
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छोटा राजन यानी 'नाना कंपनी'
छोटा राजन ने अपने शूटर ज्यादातर चेंबूर, घाटकोपर, कुर्ला और धारावी जैसे इलाकों से भर्ती किए थे. उसके ज्यादातर शूटर मराठी या दक्षिण भारतीय युवा थे.
हालांकि उसके ज्यादातर शूटर हिंदू थे, लेकिन फरीद तनाशा जैसे कुछ मुसलमान भी इसमें शामिल थे. पैसा मुख्य आकर्षण था, लेकिन युवाओं को धार्मिक और राष्ट्रवादी आधार पर भी प्रेरित किया जाता था.

छोटा राजन दाऊद इब्राहिम को देशद्रोही मानता था और उसने अपने शूटरों को उन आरोपियों को मारने का आदेश दिया था, जो कथित तौर पर 1993 के सीरियल ब्लास्ट की साजिश का हिस्सा थे.
रवि वोरा उर्फ डीके राव, सतीश थंगप्पन रेड्डी, विलास माने, साधु शेट्टी आदि 'नाना कंपनी' के सबसे खूंखार शूटरों में गिने जाते थे.
अरुण गवली यानी 'डैडी कंपनी'
गवली कभी भारत से बाहर नहीं गया, बल्कि उसने अपना गैंग या तो मुंबई की दगड़ी चॉल स्थित अपने घर से चलाया, या फिर जेल में रहने के दौरान वहीं से संचालित किया.
उसके गैंग में ज्यादातर मिल मजदूरों के परिवारों के युवा शामिल थे. अस्सी के दशक के मध्य से ज्यादातर बड़ी मिलें बंद होने लगीं, जिससे लाखों मिल मजदूर बेरोजगार हो गए.
गवली, जो खुद कभी मिल मजदूर रह चुका था, उन परिवारों के लिए एक 'मसीहा' बनकर उभरा जो अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. उसने ऐसे परिवारों के कई लड़कों को अपने गैंग में शूटर के तौर पर भर्ती कर लिया.

गवली के मामले में, शूटरों के लिए पैसा कम महत्वपूर्ण था, क्योंकि गवली अपने गैंग को एक पंथ की तरह चलाता था. शूटरों और उनके परिवारों के लिए गवली एक 'रॉबिनहुड' था, जो ज़ुल्म करने वालों के खिलाफ लड़ रहा था.
विजय टंडेल, शरद बांडवे, तान्या कोली, विजय नारकर, अशोक जोशी और सुनील घाटे, गवली से जुड़े कुछ ऐसे बड़े नाम थे, जिन पर कई हत्याओं के आरोप थे.
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अश्विन नाइक यानी 'रावण कंपनी'
1996 में पुलिस एनकाउंटर में अपने बड़े भाई अमर नाइक उर्फ रावण के मारे जाने के बाद, अश्विन नाइक ने गिरोह की कमान संभाल ली. वह जेल से भी अपना गिरोह चलाता था.
गवली गिरोह की तरह, इसके भी ज्यादातर शूटर मिल मजदूरों के परिवारों से आते थे.
रवींद्र फुपात, अनिल परब, जनार्दन परब, दशरथ रहाणे और शशिकांत सागवेकर उर्फ बाबू चिकना इस गिरोह के प्रमुख शूटर थे.
अबू सलेम की गैंग
अब्दुल कय्यूम अंसारी, जिसे अबू सलेम के नाम से जाना जाता है, पहले अनीस इब्राहिम के लिए ड्राइवर का काम करता था. 1997 में उसने डी-कंपनी छोड़ दी और अपना अलग गैंग चलाकर काम करने लगा.
वह उत्तर प्रदेश के अपने गृह जिले आजमगढ़ से ऐसे बेरोजगार युवाओं को लाता था, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था या बहुत कम था, और उनसे मुंबई में हत्याएं करवाता था.

सलेम के ज्यादातर निशाने पर फिल्मी हस्तियां या बिल्डर होते थे, जो उससे फिरौती की कॉल आने के बाद पैसे देने से इनकार कर देते थे.
सलीम हड्डी, दीपक सिंह, मेहंदी हसन और अब्दुल रज्जाक, सलेम के गिरोह के कुछ मुख्य शूटर थे.
कैसे खत्म हुआ अंडरवर्ल्ड?
अंडरवर्ल्ड गैंग से की जा रही हत्याओं में बढ़ोतरी को देखते हुए, मुंबई पुलिस ने इस संकट से सख्ती से निपटने का फैसला किया.
हालांकि, गिरोह के सरगना या तो विदेश में सुरक्षित थे या जेल के अंदर, लेकिन उनके शूटर या तो पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए या फिर 'महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट' (MCOCA) जैसे कड़े कानूनों के तहत जेल भेज दिए गए.
मुंबई का अंडरवर्ल्ड इसलिए बिखर गया क्योंकि पुलिस की सख्त कार्रवाई के कारण नए शूटरों की भर्ती रुक गई.
अंडरवर्ल्ड के शूटरों की कहानी यह बताती है कि किसी आपराधिक गिरोह को चलाने के लिए शूटर बहुत जरूरी होते हैं... लेकिन साथ ही, उन्हें आसानी से छोड़ा भी जा सकता है.
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