- महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों पर मराठी भाषा अनिवार्य कर दी है.
- ड्राइवरों का कहना है कि 100 रुपए के नोट पर कई भाषाएं हैं, सभी राज्यों में चलता है.
- मुंंबई के ड्राइवरों ने कहा- सम्मान से सिखाओ तो सीखेंगे, जबरदस्ती थोपा तो नहीं सीखेंगे.
महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों पर मराठी भाषा थोपे जाने का मामला सुर्खियों में बना हुआ है. सोमवार को कांदिवली में ड्राइवरों ने अपनी गाड़ियां खड़ी करके मराठी भाषा से जुड़े नियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया. ड्राइवरों का कहना है कि शहर में गाड़ी चलाने के लिए मराठी भाषा सीखने का दबाव डालना 'गलत' है. प्रदर्शनकारियों के न्याय की मांग को लेकर तीन दिन की हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया. ऐसे में एनडीटीवी ने पीड़ित ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों से बातचीत की है. ड्राइवरों का कहना है कि महाराष्ट्र में हमसे मराठी बोलने को कहा जा रहा है. क्या हम भी किसी सड़क पर किसी से भी अचानक मराठी में बात करना शुरू कर दें और कहें कि पहले मराठी बोलो, तभी आगे बढ़ोगे?
एक चालक ने कहा, "एक थ्री-स्टार ऑफिसर आता है और हमसे गांव वाली मराठी बोलने को कहता है. नहीं बोल पाने पर ₹20-25 हजार तक का भारी जुर्माना लगाया जा रहा है."
'नोट पर सारी भाषाएं लिखी हैं...'
एक ड्राइवर में 100 रुपए का नोट दिखाते हुए कहा कि इस पर इतनी सारी भाषाएं लिखी हैं और यही नोट देश के 27 राज्यों में चलता है. फिर महाराष्ट्र में सिर्फ मराठी बोलना ही अनिवार्य क्यों किया जा रहा है? कुछ मराठी शब्द ऐसे हैं, जिनका सही उच्चारण करने के लिए दांतों की जरूरत पड़ती है. मेरे दांत ही नहीं हैं, तो मैं उन शब्दों का सही उच्चारण कैसे करूं?
'बच्चों को स्कूल भेजें या खुद जाएं...'
ड्राइवर ने आगे कहा कि हमने अपनी पूरी जिंदगी रिक्शा चलाने में लगा दी. अब समझ नहीं आ रहा कि बच्चों को स्कूल भेजें या खुद स्कूल जाएं. इस पूरे मामले को राजनीतिक क्यों बनाया जा रहा है? हम सरकार से उम्मीद करते हैं कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले और हमारी बात सुने.
एक ऑटो चालक ने कहा, "सिर्फ इसलिए कि हम मराठी नहीं बोलते, क्या हम महाराष्ट्र के लिए खतरा बन गए हैं? एमएनएस वालों को भी कभी न कभी इमरजेंसी में, किसी भी परिस्थिति में रिक्शे की जरूरत पड़ेगी. राज ठाकरे सिर्फ राजनीति और हिंसा की बात करते हैं. वह खुद अपने घर से बाहर नहीं निकलते और अपने बेटे अमित ठाकरे को भी घर से बाहर नहीं निकलने देते."
उन्होंने आगे कहा कि सिर्फ अपनी खिड़की से शिवाजी पार्क दिखाई देता है, इसका मतलब ये नहीं कि आपको पूरी मुंबई के बारे में सब कुछ पता है. हमें कमजोर मत समझिए, हम अच्छे दिल वाले लोग हैं, लेकिन हमें परेशान मत कीजिए.
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'क्या हम महाराष्ट्र छोड़ दें...'
एक ड्राइवर ने कहा, "जिस उम्र में बच्चों को स्कूल भेजना चाहिए, उस उम्र में हमें खुद स्कूल जाना पड़ रहा है. कोर्स में जो कुछ सिखाया जा रहा है, वह हमसे नहीं पूछा जा रहा. अधिकारी ऐसे मराठी शब्द पूछ रहे हैं, जिन्हें हमने शायद जिंदगी में कभी सुना तक नहीं. हम सिर्फ इतना पूछना चाहते हैं क्या सरकार चाहती है कि हम महाराष्ट्र छोड़ दें? अगर ऐसा है तो हम चले जाएंगे, लेकिन हमें इस तरह परेशान तो मत कीजिए."
'अगर थोपा जाएगा, तो...'
ड्राइवर ने कहा कि जब महाराष्ट्र का कोई शख्स बनारस या उत्तर प्रदेश के किसी मंदिर में जाता है, तो क्या उससे कहा जाता है कि पहले भोजपुरी बोलो, तभी तुम्हें पूजा करने या आशीर्वाद लेने दिया जाएगा? अगर वहां ऐसा नहीं होता, तो हमारे साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है?
ऑटो चालक ने कहा कि अगर हमें सम्मान से पढ़ाया जाए और सीखने के लिए वक्त दिया जाए, तो हम खुशी से मराठी सीखेंगे. लेकिन अगर भाषा को जबरदस्ती थोपा जाएगा, तो चाहे जो हो जाए, हम मराठी नहीं सीखेंगे.
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