- गिरगांव चा राजा गणपति पंडाल मुंबई के दक्षिणी मराठी इलाके में पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है
- 1928 से मिट्टी से बनी मूर्तियां ही स्थापित की जाती हैं ताकि जल प्रदूषण से बचा जा सके
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में इस पंडाल की पर्यावरण जागरूकता के लिए प्रशंसा की थी
महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्योहार अब खत्म होने वाला है, और मुंबई के अलग-अलग गणपति पंडालों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. हज़ारों पंडालों में से एक पंडाल ऐसा है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पसंदीदा है. पीएम मोदी ने इसकी तारीफ़ इसकी भव्यता के लिए नहीं, बल्कि इससे लोगों तक पहुंचने वाले संदेश के लिए की है. दक्षिण मुंबई के मराठी आबादी वाले इलाके में स्थित 'गिरगांव चा राजा' गणपति पंडाल हर साल पर्यावरण संरक्षण के महत्व को उजागर करता है.
तब प्रदूषण से अनजान थे लोग
1928 में, जब गिरगांव की निकडवारी लेन में पहली बार 'गिरगांव चा राजा' की मूर्ति स्थापित की गई थी, तब पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के बारे में ज़्यादा जागरूकता नहीं थी. प्रदूषण के खिलाफ़ कोई बड़े अभियान नहीं चल रहे थे, और लोग ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों से अनजान थे. हालांकि, इस गणपति पंडाल के संस्थापकों ने एक दूरदर्शी फैसला लिया. उन्होंने तय किया कि हर साल सिर्फ़ मिट्टी से बनी मूर्ति ही स्थापित की जाएगी. जहां कई मूर्तियां प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनती थीं, वहीं 'गिरगांव चा राजा' को पूरी तरह से मिट्टी से बनाया गया. यह फ़ैसला इसलिए लिया गया ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले उस बुरे असर को रोका जा सके जो प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी मूर्तियों के समुद्र, नदी या झील जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों में विसर्जन से होता था. इस उत्सव की शुरुआत को 99 साल हो चुके हैं, लेकिन पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियां लाने का फ़ैसला पीढ़ी-दर-पीढ़ी गर्व के साथ निभाया जा रहा है.
कुछ मिनट लगते हैं घुलने में
इस गणपति पंडाल की पर्यावरण-अनुकूल पहचान प्रधानमंत्री मोदी तक भी पहुंची. 2017 में, अपने "मन की बात" कार्यक्रम में मोदी ने 'गिरगांव चा राजा' का ज़िक्र किया और पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए इसकी तारीफ की. उस साल के बाद से 'गिरगांव चा राजा' को "मोदी के पसंदीदा गणपति" के तौर पर जाना जाने लगा. 24 फ़ीट ऊंची यह मूर्ति जब गिरगांव चौपाटी पर अरब सागर के पानी में विसर्जित की जाती है, तो इसे घुलने में कुछ ही मिनट लगते हैं और इससे समुद्री जीवों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता और न ही पानी प्रदूषित होता है.
गलियों से अरब सागर का सफर
पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से बनी होने के अलावा, यह मूर्ति अपनी कलात्मक खूबी की वजह से भी लोगों को बहुत आकर्षित करती है. मुंबई के सबसे चहेते देवता की इस भव्य मूर्ति की सूंड पर भगवान कृष्ण की तस्वीर बनी है, जो इसे बाकी सभी मूर्तियों से अलग बनाती है. 'गिरगांव चा राजा' का विसर्जन जुलूस भी इस उत्सव का एक मुख्य आकर्षण होता है. पारंपरिक वेशभूषा में बड़ी संख्या में युवा ढोल और लेज़िम नृत्य के साथ भगवान को विदाई देते हैं, जबकि वे गिरगांव की ऐतिहासिक गलियों से होते हुए धीरे-धीरे अरब सागर की ओर बढ़ते हैं.
यह भी पढ़ें-
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं