- मोहन भागवत ने कहा कि भारत के लोग मेक्सिको से साइबेरिया तक पैदल और नाव से ज्ञान का प्रसार करते रहे
- उन्होंने हिंदू शब्द की परिभाषा पर कहा कि यह किसी भाषा, उपासना या जीवन-शैली तक सीमित नहीं है
- मोहन भागवत ने बताया कि भारत में मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी समुदायों को सुरक्षित और शांतिपूर्ण आश्रय मिला है
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कनाडा के टोरंटो में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि भारत के लोग मेक्सिको से साइबेरिया तक गए और लोगों को ज्ञान दिया. लेकिन किसी का धर्मांतरण नहीं कराया. संघ प्रमुख ने कहा, 'वे पैदल हिमालय पार करके चीन गए, साइबेरिया गए, मंगोलिया गए, छोटी नावों से गए। वे दक्षिण-पूर्व एशिया गए। उस समय की ज्ञात विश्व तक वे पहुंचे.' मोहन भागवत ने 'हिंदू विश्व बंधु' आयोजन को संबोधित करते हुए कहा कि और उन्होंने क्या किया? उन्होंने किसी देश पर विजय प्राप्त नहीं की. उन्होंने किसी को धर्मांतरित नहीं किया. वे जहां भी गए, उन्होंने ज्ञान दिया, गणित दिया, ज्योतिष दिया, आयुर्वेद दिया और सभ्यतागत मूल्यों का प्रसार किया.
इस दौरान मोहन भागवत ने हिंदू शब्द की अवधारणा पर भी बात की. आरएसएस चीफ ने कहा, 'जब मैं हिंदू कहता हूं तो ‘हिंदू' शब्द को किसी विशिष्ट भाषा, किसी विशिष्ट उपासना या किसी विशिष्ट जीवन-शैली के माध्यम से परिभाषित नहीं किया जा सकता। हिंदू सभी का सम्मान करते हैं. हिंदू सभी को स्वीकार करते हैं। उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं होती' उन्होंने कहा, 'हम कहते हैं कि हमारी सभी प्रार्थनाएं भारत कहलाने वाली भूमि से उत्पन्न हुई हैं. किंतु वे कभी केवल भारत के लिए नहीं थीं. वे उस पूरे ब्रह्मांड के लिए थीं, जिसे हम जानते हैं.'
उन्होंने कहा, 'मैं आपको कोई नई बात नहीं बता रहा हूं. मैं वही बता रहा हूं, जो आप परंपरागत रूप से सीखते आए हैं, जिसे आप परंपरागत रूप से जपते और गाते आए हैं.आप इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. अब समय आ गया है कि हिंदुओं को इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि विश्व को इन सभी बातों की आवश्यकता है.' उन्होंने कहा, 'हमें वह सृजित करना है, जिसकी विश्व को आवश्यकता है और फिर उसे देना है। सवाल है कि हम उसे कैसे दें? हम किसी पर दबाव नहीं डालते. हमारे पूर्वज हर देश में गए. उन्होंने कभी किसी पर कुछ थोपा नहीं. हम ऐसे नेता हैं, जो भीतर से नेतृत्व करते हैं और उदाहरण के द्वारा नेतृत्व करते हैं.'
मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी, सबको भारत में मिली सुरक्षित शरण
संघ प्रमुख ने इस दौरान कुछ वाकये भी सुनाए और भारत की सहिष्णुता के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से भारत में बिना उत्पीड़न के भय के शांतिपूर्ण आश्रय पाया है. ऐसा ही एक उदाहरण उन्होंने पोलैंड का दिया. मोहन भागवत ने कहा, 'दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के निवासी, जिनमें से अनेक शरणार्थी बन गए थे, समुद्र पार करके भारत आए. उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था. उस समय भारत में ब्रिटिश शासन था और उन्होंने शरण देने से इनकार कर दिया. तब जामनगर एक रियासत था. जामनगर के राजकुमार ने उन्हें बुलाया और कहा, ‘यहां आइए, यहां बस जाइए. जब तक आपका देश फिर से आपके लिए स्वतंत्र नहीं हो जाता और आप यहां से जाने के लिए स्वतंत्र नहीं होते, तब तक मैं आपकी रक्षा करूंगा. और यह चलता आ रहा है.'
मोहन भागवत बोले- मिडल ईस्ट में आपदा आई तो सिर्फ भारतीयों को नहीं बचाया
उन्होंने आगे कहा, 'कुछ वर्ष पहले जब मध्य-पूर्व में युद्ध हुआ और लोग वहां फंस गए थे. तब भारत के सैन्य विमान वहां गए और लोगों को बचाकर लाए. केवल भारतीय ही नहीं बल्कि सात देशों के नागरिकों को वहां से बचाया गया. जब भी विश्व में कहीं संकट आया और भारत से सहायता मांगी गई, भारत ने कभी मना नहीं किया. बल्कि बिना मदद के लिए पुकार किए भी वह सहायता करता है. यही परंपरा है. यही भारत का डीएनए (मूल स्वभाव) है.'
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