- मिथुन चक्रवर्ती ने अपने करियर की शुरुआत में हीरो के रूप में स्वीकार्यता नहीं पाई, फिर भी वो सुपरस्टार बने
- मिथुन ने 1960 के दशक में नक्सल आंदोलन में भाग लिया और बाद में परिवार की जिम्मेदारी के कारण एक्टिंग की पढ़ाई की
- वे पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु के करीबी थे, बाद में टीएमसी जॉइन कर राज्यसभा सांसद बने और फिर बीजेपी में आए
मिथुन चक्रवर्ती ने फिल्मी दुनिया में जब कदम रखने की कोशिश की तो उन्हें हीरो के लायक ही नहीं माना गया. उन दिनों अमिताभ बच्चन सुपरस्टार थे पर दो अंजाने फिल्म में कुछ सेकेंड की भूमिका करने वाले मिथुन चक्रवर्ती को अमिताभ बच्चन की कुर्सी का दावेदार माना जाने लगा. मगर, मिथुन चक्रवर्ती ने कभी इस बात को सिर पर हावी नहीं होने दिया और गंगा, जमुना, सरस्वती और अग्निपथ फिल्मों में अमिताभ बच्चन से कमतर भूमिकाएं स्वीकार कर लीं. क्या अमीर, क्या गरीब हर कोई उस समय मिथुन का दिवाना हुआ करता था. मगर फिर मिथुन ने ऊटी का रुख किया और अपना होटल बनवाने लगे. धीरे-धीरे वो बॉलीवुड से दूर होते गए और अपनी खुद की इंडस्ट्री खड़ी कर दी. जहां लाइन से फिल्में बनती थीं और सबकी शूटिंग ऊटी में हुआ करती थी. ये फिल्में कम बजट में समाज के सबसे नीचे तबके के लिए बनाई जातीं और खूब प्यार पातीं. कुछ साल बॉलीवुड से दूर रहने के बाद फिर मिथुन चक्रवर्ती ने बॉलीवुड में वापसी की और मणिरत्नम की फिल्म गुरु में अपनी एक्टिंग से लोहा मनवा दिया और आज तक सक्रिय हैं. हालांकि, कम ही लोगों को पता है कि फिल्मों से भी पहले मिथुन राजनीति में एक्टिव हो गए थे.

यूं आए राजनीति में
1960 के दशक के अंत में, जब मिथुन 20 साल के थे और कॉलेज में पढ़ते थे तो उस समय बंगाल में अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा का प्रभाव था. हजारों बंगाली युवाओं की तरह मिथुन भी नक्सल आंदोलन में शामिल हो गए. नक्सलियों के उग्र नेता चारू मजूमदार से उनके करीबी संबंध थे. कुख्यात नक्सली रवि रंजन के भी काफी करीब थे. एक नक्सली अभियान के दौरान उनके बड़े भाई की करंट लगने से मौत हो गई. इस हादसे के बाद उनके पिता ने उन्हें कोलकाता छोड़ने को कहा. बंगाल में नक्सलियों पर पुलिस की सख्ती शुरू हो चुकी थी. मिथुन अंडरग्राउंड हो गए, महीनों छिपते रहे. परिवार संभालने के लिए आंदोलन छोड़ दिया और सीधे पुणे FTII में एक्टिंग कोर्स किया.

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1970 के दशक में मिथुन मुंबई आ गए. फिर भी वामपंथी करीबी बने रहे. वो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के करीबी थे और मुफ्त में शो किया करते थे. जब भी CPM सरकार फंड जुटाने का कार्यक्रम करती, मिथुन मुफ्त में परफॉर्म करते थे. वो इन बातों को छिपाते भी नहीं था. मगर, ज्योति बसु की मौत के बाद मिथुन ने CPM से दूरी बनानी शुरू कर दी. फिर 2014 में TMC जॉइन की. राज्यसभा गए.

फिर ममता बनर्जी को क्यों छोड़ा
2016 में शारदा घोटाले में नाम आने पर मिथुन चक्रवर्ती ने राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने सेहत की वजह से इस्तीफा देना बताया और कहा कि वो राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. इसके 5 साल बाद, 7 मार्च 2021 को पीएम मोदी की मौजूदगी में मिथुन चक्रवर्ती ने बीजेपी ज्वाइन की. रैली के बाद मिथुन चक्रवर्ती ने कहा कि सिर्फ एक पार्टी गरीबों की मदद कर रही है और अगर उन्हें इस सपने को साकार करना है तो किसी न किसी का हाथ पकड़ना पड़ेगा.

70 साल के चक्रवर्ती ने संवाददाताओं से कहा, "आप मुझे मतलबी या कुछ और कह सकते हैं, लेकिन मेरे निस्वार्थ होने की वजह है कि मैं गरीब लोगों के साथ रहना चाहता हूं. मैं उनके लिए लड़ूंगा. मैं जब 18 साल का था तो मेरा सपना था कि मैं गरीब लोगों के साथ रहना चाहूंगा.मैं उनकी मदद करूंगा, मैं उन्हें उनका सम्मान दिलाने के लिए काम करूंगा." मिथुन चक्रवर्ती ने कहा, वह कभी किसी पार्टी से जुड़े नहीं रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया था. उन्होंने टीएमसी से राज्यसभा सदस्य बनने को अपना गलत निर्णय बता. मिथुन ने कहा, "मैं राज्यसभा सांसद का पद छोड़ दिया. मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं देना चाहता. यह मेरा गलत फैसला था. इस मुद्दे को यही खत्म कर देना बेहतर है." हालांकि, टीएमसी नेताओं ने उनपर खुलकर आरोप लगाए कि मिथुन केंद्रीय जांच एजेंसियों से डरकर बीजेपी में शामिल हुए हैं.
पीएम मोदी से नजदीकी फिर क्यों नहीं मिला पद
बंगाल 2021 विधानसभा चुनाव हो या 2026 विधानसभा चुनाव मिथुन चक्रवर्ती ने गली-गली और गांव-गांव में बीजेपी के लिए प्रचार किया. वो ममता बनर्जी और टीएमसी के आरोपों का बहुत हाजिर-जवाबी से जवाब भी देते आए. पीएम मोदी जब-जब बंगाल आते मिथुन चक्रवर्ती से उनकी नजदीकी साफ झलकती. दोनों मंच पर ही कई बार एक-दूसरे से गंभीर मुद्रा में बातें करते नजर आए. यहां तक की कई लोग तो मिथुन चक्रवर्ती को भी बंगाल का अगला मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहे थे, मगर कल जब शुभेंदु अधिकारी के नाम का ऐलान अमित शाह ने किया तो साफ हो गया कि मिथुन चक्रवर्ती मुख्यमंत्री तो नहीं बनने जा रहे हैं.

फिर आज जब मंत्रियों का शपथ ग्रहण हुआ तो भी उसमें मिथुन चक्रवर्ती का नाम नहीं था. मगर मंच पर मिथुन मौजूद थे. पीएम मोदी ने आज भी मिथुन दा का हालचाल उतने ही अपनेपन से लिया. मिथुन दा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं, बल्कि वही मुस्कान नजर आई. साफ था ना तो उन्होंने मुख्यमंत्री या मंत्री बनने की कोशिश की और ना ही उनका ऐसा कोई इरादा था. अगर मिथुन चाहते तो कम से कम मंत्री बनने से तो उन्हें कोई नहीं रोकता. इस बात को मजबूती इससे भी मिलती है कि मिथुन चक्रवर्ती को बीजेपी में आए करीब 5 साल हो गए. मगर वो राज्यसभा नहीं गए. अगर वो चाहते तो बीजेपी आसानी से उन्हें राज्यसभा भेज चुकी होती. तो साफ है कि मिथुन ने बीजेपी में शामिल होते ही जो बात कही थी, वो आज बिल्कुल साबित हो गई कि वो गरीबों की सेवा के लिए बीजेपी में आएं हैं भले ही कोई उन्हें उन्हें मतलबी समझें या कुछ और.
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