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कानपुर के संजय मेहरोत्रा को अमेरिका ने किया था 3 बार रिजेक्ट, आज उन्हीं के बनाए मेमोरी कार्ड पर चल रही दुनिया

Micron CEO Sanjay Mehrotra Success story: तीन बार अमेरिका वीजा रिजेक्ट होना और फिर अमेरिका जाकर बिलियन डॉलर की कंपनी खड़ी करना, ये काम सिर्फ एक हिंदुस्तानी ही कर सकता है. आज की जीरो से हीरो की कहानी कानपुर के संजय मेहरोत्रा की.

कानपुर के संजय मेहरोत्रा को अमेरिका ने किया था 3 बार रिजेक्ट, आज उन्हीं के बनाए मेमोरी कार्ड पर चल रही दुनिया
Micron CEO Sanjay Mehrotra Success story

ये कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के हर उस घर की है, जहां छोटी आंखों में बड़े सपने पलते हैं. यह कहानी है जिद की, जुनून की, और एक पिता के अटूट भरोसे की, जिसने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया. कानपुर की गलियों से निकला एक लड़का, जिसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने एक नहीं, तीन-तीन बार दरवाजा दिखाकर कह दिया- "REJECTED". आज उसी लड़के के बनाए मेमोरी चिप्स पर पूरी दुनिया चल रही है. और आज 1 ट्रिलियन डॉलर कंपनी का CEO है. जीरो से हीरो सीरीज में कहानी कानपुर के संजय मेहरोत्रा की.

साल 1958. कानपुर का एक साधारण मिडिल क्लास परिवार. पिता एक कॉटन मिल में अफसर थे, तनख्वाह छोटी थी, लेकिन इरादे आसमान छूने के थे. उनके घर जन्म हुआ सबसे छोटे बेटे संजय का. बचपन से ही पढ़ाई में होनहार संजय ने दिल्ली के सरदार पटेल विद्यालय और फिर देश के नामी इंजीनियरिंग कॉलेज, बिट्स पिलानी तक का सफर तय किया.

जब सपने टूटने की कगार पर थे

असली उड़ान का मौका आया 1976 में, जब अमेरिका की मशहूर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से संजय मेहरोत्रा के नाम एडमिशन का खत आया. सपना अब बस एक वीजा की दूरी पर था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. पहली बार वीजा रिजेक्ट हुआ. दूसरी बार भी वही जवाब. और तीसरी बार भी रिजेक्टेड.

Micron CEO Sanjay Mehrotra Success and motivational Story, Kanpur Boy SanDisk Founder , Rejected 3 Times by US

संजय पूरी तरह टूट चुके थे. उन्हें लगा कि उनका सपना, उनकी मेहनत, सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया. जरा 1976 के उस दौर की कल्पना कीजिए. न इंटरनेट था, न कोई ऑनलाइन अपील. एम्बेसी का न मतलब पत्थर की लकीर. ऐसे में एक आम हिंदुस्तानी परिवार के पास क्या बचता है? सिर्फ एक चीज जिद.

एक पिता जो चट्टान बन गया

ये जिद संजय की नहीं, उनके पिता की थी. वो बाप दिल्ली की उस एंबेसी की लॉबी से हिला तक नहीं. वो घंटों इंतजार करते रहे. जैसे ही लंच के बाद अमेरिकी काउंसिल वापस लौटा, वो सीधे उसके ऑफिस में घुस गए. उस दिन वो सिर्फ एक पिता नहीं थे. वो अपने बेटे के लिए मैनेजर और वकील भी बने. करीब 20 मिनट तक एक पिता ने एक अफसर से अपने बेटे की काबलियत और उसके सपनों को लेकर जोरदार बहस की. आखिर में, उस अफसर को एक पिता के जज्बे के आगे झुकना पड़ा और वीजा पर मुहर लग गई. महज 18 साल की उम्र में अमेरिका चले गए. बर्कले से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. संजय अक्सर कहते हैं कि उस दिन उनके पिता ने जो हार न मानने का सबक सिखाया, उसी ने टेक इंडस्ट्री में उनकी बुनियाद रखी.

आसमान में एक नई उड़ान

पहली नौकरी की शुरुआत इंटेल से की. इसके बाद 1988 में, उन्होंने अपने साथियों एली हरारी और जैक युआन के साथ मिलकर 'सैनडिस्क' (SanDisk) नाम की कंपनी की नींव रखी. वही सैनडिस्क जिसने दुनिया को 'फ्लैश मेमोरी' या आसान भाषा में कहें तो 'मेमोरी कार्ड' का तोहफा दिया. 2016 में, सैनडिस्क करीब 16 बिलियन डॉलर (सवा लाख करोड़ रुपये से ज्यादा) में बिकी, और इस डील के सूत्रधार भी संजय ही थे. इसे वेस्टर्न डिजिटल ने खरीद लिया. 

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माइक्रोन: डूबते जहाज से ट्रिलियन डॉलर के साम्राज्य तक

सैनडिस्क बिकने के एक साल बाद, 2017 में संजय को 'माइक्रोन टेक्नोलॉजी' का सीईओ बनाया गया. उस वक्त माइक्रोन के शेयर की कीमत महज 30 डॉलर के आसपास थी. लेकिन संजय के लीडरशिप में कंपनी ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि आज यह अमेरिका की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शुमार है. खासकर, आज के दौर में जब हर तरफ AI का शोर है, तब हाई-परफॉरमेंस मेमोरी चिप्स की भारी मांग है. माइक्रोन ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और देखते ही देखते 1 ट्रिलियन डॉलर का जादुई आंकड़ा पार कर लिया. यह कहानी ट्रिलियन डॉलर की नहीं है. यह उस जिद की कीमत है, जो एक बाप ने अपने बेटे के लिए दिखाई. हिंदुस्तान के हर मिडिल क्लास घर में ऐसी ही एक जिद छिपी होती है.

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