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नौकरी मिलती नहीं, मिल भी गई तो पुरुषों से कम तनख्वाह.... अब भी 'बराबरी के हक' के लिए लड़ती महिलाएं

राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देने का मुद्दा गरमाया हुआ है. लेकिन सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि आसपास की महिलाओं में भी बराबरी लाना बहुत जरूरी है.

नौकरी मिलती नहीं, मिल भी गई तो पुरुषों से कम तनख्वाह.... अब भी 'बराबरी के हक' के लिए लड़ती महिलाएं
सांकेतिक तस्वीर.
AI Generated Image
  • भारत में कामकाजी उम्र की महिलाओं की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है
  • महिलाओं की कार्यशील जनसंख्या अनुपात पुरुषों के लगभग आधे के बराबर है, जिससे रोजगार में असमानता स्पष्ट होती है
  • शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की बेरोजगारी दर पुरुषों से अधिक है, जो काम मिलने में उनके लिए चुनौतियां दर्शाती है
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नई दिल्ली:

कहने को आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन जब बात बराबरी की आती है तो ये महिलाएं काफी पीछे दिखाई पड़ती हैं. बात जब राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर हो रही है तो ये जानना भी जरूरी है कि इन महिलाओं को ज्यादातर जगह गैर-बराबरी का सामना करना ही पड़ता है. फिर चाहे बात रोजगार की हो या फिर मिलने वाली तनख्वाह की. हर चीज में महिलाओं को पुरुषों से कम ही आंका जाता है. 

राजनीति तो दूर की बात है लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि हमारे आसपास की महिलाओं में भी बराबरी लाना ज्यादा जरूरी है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं को न तो नौकरी मिलती है और अगर मिल भी जाती है तो उन्हें उसी काम के लिए उतनी तनख्वाह नहीं मिलती, जितनी पुरुषों को मिलती है.

नौकरियों में कितनी गैर-बराबरी?

नौकरी की स्थिति को लेकर तीन आंकड़े होते हैं. पहला- लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट यानी LFPR. दूसरा- वर्कर पॉपुलेशन रेशो यानी WPR. तीसरा- बेरोजगारी दर यानी UR.

LFPR से पता चलता है कि कामकाजी उम्र के कितने लोग काम कर रहे हैं या काम ढूंढ रहे हैं? WPR बताता है कि असल में कामकाजी उम्र के कितने लोग काम कर रहे हैं? और बेरोजगारी दर से पता चलता है कि LFPR में शामिल कितने लोग बेरोजगार हैं?

केंद्र सरकार के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुषों में LPFR 59.1% और महिलाओं में 30.7% है. यानी, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या आधी ही है जो काम कर रही हैं या काम ढूंढ रही हैं. इसका सीधा-सीधा मतलब ये हुआ कि हर 10 में से 6 पुरुष के पास काम है या फिर वह काम ढूंढ रहा है. जबकि, हर 10 में से 3 महिला ही या तो काम कर रही है या फिर काम ढूंढ रही है.

इसी तरह पुरुषों में WPR 57.2% और महिलाओं में 29.8% है. यहां भी महिलाओं की संख्या लगभग आधी ही है. बेरोजगारी दर पुरुषों और महिलाओं में 3.1% है. हालांकि, जब शहरों में बेरोजगारी दर की तुलना की जाए तो पुरुषों में यह 4.2% और महिलाओं में 6.4% है. यानी, महिलाओं में बेरोजगारी दर पुरुषों से काफी ज्यादा है.

PLFS के मुताबिक, जनवरी से दिसंबर 2025 के दौरान देश में 15 साल और उससे ज्यादा की उम्र के कामगारों की संख्या 61.6 करोड़ लोग थे. इनमें से 41.6 करोड़ पुरुष और 20 करोड़ महिलाएं थीं. यानी, नौकरियों में तो महिलाएं अभी भी पुरुषों से बहुत दूर हैं.

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और कमाई में भी बहुत अंतर

महिलाओं और पुरुषों की कमाई में भी बहुत अंतर है. एक ही काम के लिए महिला और पुरुष की कमाई में लगभग 6 हजार रुपये का अंतर है.

PLFS के मुताबिक, सैलरी पाने वाले पुरुषों की औसत आय 2025 में 24,217 रुपये है, जबकि महिलाओं की औसत आय 18,353 रुपये है. हालांकि, 2024 की तुलना में 2025 में महिलाओं की आय पुरुषों की तुलना में ज्यादा बढ़ी है. 2024 में पुरुषों की औसत आय 22,891 रुपये और महिलाओं की 17,126 रुपये थी. 2025 में पुरुषों की औसत आय 5.8% और महिलाओं की 7.2% बढ़ी.

आंकड़ों से पता चलता है कि नौकरी या दिहाड़ी की तुलना में अपना काम करने वालीं महिलाओं की संख्या ज्यादा है. खुद के काम में भी पुरुष और महिलाओं की कमाई में बहुत अंतर है. खुद का काम करने वाले पुरुषों की औसतन कमाई 17,914 रुपये है. जबकि, महिलाएं हर महीने औसतन 6,374 रुपये ही कमा पाती हैं.

इतना ही नहीं, महिलाओं को दिहाड़ी मजदूरी भी पुरुषों की तुलना में कम ही मिलती है. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले पुरुषों को हर दिन औसतन 455 रुपये मिल जाते हैं. लेकिन महिलाओं को 315 रुपये ही मजदूरी मिलती है.

नौकरी और उसके मेहनताने में ये अंतर दिखाता है कि सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि महिलाओं को काम और तनख्वाह में बराबरी देना जरूरी है.

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