- अमेरिका और चीन के बीच बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय बैठक में प्रतिनिधिमंडल में एक भी महिला शामिल नहीं थी
- सोशल मीडिया और विशेषज्ञों ने इस बैठक की पूरी पुरुष प्रधानता पर आलोचना करते हुए लैंगिक असमानता को उजागर किया
- हार्वर्ड की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने कहा- यह स्थिति योग्यता के बजाय नेटवर्किंग आधारित व्यवस्था को दर्शाती है
Donald Trump- Xi Jinping Meeting in Beijing: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय चीन पहुंचे हुए हैं. बीजिंग में जब गुरुवार, 14 मई को दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, अमेरिका और चीन के नेताओं की बड़ी बैठक हुई तो वहां सबकुछ बेहद भव्य और ताकत दिखाने वाला था. सैनिकों की परेड थी, झंडे लहराते बच्चे थे, एक से बढ़कर एक कारोबारी और वरिष्ठ अधिकारी वहां मौजूद थे. लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक चीज ने लोगों का सबसे ज्यादा ध्यान खींचा- बैठक की मेज पर एक भी महिला नहीं थी. सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को लेकर तेज बहस शुरू हो गई. सवाल उठाया जा रहा है कि क्या दुनिया की सबसे ताकतवर राजनीति में महिलाओं की आवाज अब भी पीछे धकेली जा रही है? सवाल उठाने वालों में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इकनॉमिक्स की प्रोफेसर और IMF की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ भी शामिल हैं.
एक भी महिला को जगह नहीं
गुरुवार को जब डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में मिले, तब इस द्विपक्षीय बैठक की मेज पर एक चीज साफ तौर पर गायब थी- दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों में एक भी महिला मौजूद नहीं थी. इस तस्वीर की सोशल मीडिया पर आलोचना शुरू हो गई. कई लोगों ने इसे पुरुष प्रधान ताकत का साफ प्रदर्शन बताया. गीता गोपीनाथ ने एक ट्वीट किया और लिखा, “यह मेरिट आधारित व्यवस्था के अंत की तस्वीर है: दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बैठक और मेज पर एक भी महिला नहीं.”

द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार उसके साथ बातचीत में गीता गोपीनाथ ने अपने बयान को और विस्तार से समझाया. उन्होंने कहा, “हम फिर से इस सोच की तरफ लौट गए हैं कि योग्यता आपकी क्षमता नहीं, बल्कि आप कितने कनेक्शन रखते हैं, यह मायने रखता है. यही तय करता है कि आपको मेज पर जगह मिलेगी या नहीं... यह समझ से बाहर है कि दुनिया में इतनी प्रतिभाशाली महिलाओं के होने के बावजूद भी पूरी मेज सिर्फ एक ही जेंडर के लोग कैसे हो सकते हैं.”
ओबामा के समय तस्वीर ऐसी नहीं थी
इस रिपोर्ट के अनुसार स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के फेमिनिस्ट, जेंडर और सेक्सुअलिटी स्टडीज प्रोग्राम की एसोसिएट डायरेक्टर हलीमा काजेम ने भी इसी तरह की बात कही. उन्होंने इसकी तुलना बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहने के दौरान हुई अमेरिका-चीन बैठकों से की और कहा, “हम पीछे चले गए हैं. ओबामा के समय अमेरिका-चीन बैठकों में महिलाएं मौजूद रहती थीं. अब दोनों महाशक्तियां यह मानती दिख रही हैं कि जहां बड़ी ताकतों की राजनीति होती है, वहां महिलाओं की जगह नहीं है. यह सिर्फ अमेरिका की विफलता नहीं, बल्कि दोनों देशों का ऐसा संकेत है कि वैश्विक व्यवस्था तय करने में महिलाओं की आवाज मायने नहीं रखती.”
बता दें कि ओबामा के समय अमेरिका-चीन बैठकों में मौजूद महिलाओं में चीन की तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री लियू यानदोंग, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसान राइस और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन शामिल थीं.
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